आतंक के विरुद्ध कठिन हुई लड़ाई: मौलवियों की संलिप्तता ने बढ़ाई चिंता
फरीदाबाद में हाल ही में उजागर हुए आतंकी मॉड्यूल ने सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता की एक नई लहर पैदा कर दी है, जिसमें दो मौलवियों की संलिप्तता पाई गई है। यह घटना इस बात का एक गंभीर संकेत है कि कैसे धार्मिक उपदेश के स्थान जिहादी विचारधारा के प्रसार का माध्यम बन सकते हैं। जब दीन और ईमान की शिक्षा देने वाले ही आतंकवाद का पाठ पढ़ाने लगें, तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की कठिनाई स्वतः ही कई गुना बढ़ जाती है।
यह लड़ाई इसलिए और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि ऐसे स्वर भी उभर रहे हैं जो डॉक्टरों के आतंकी बनने के पीछे मुसलमानों के साथ कथित दुर्व्यवहार को कारण बता रहे हैं। यह केवल कुछ नेताओं का मत नहीं है, बल्कि लंबे समय से कई राजनेता इसी प्रकार की बातें करते रहे हैं। ऐसे बयान आतंकवाद की राह पर चलने वालों को अपनी गतिविधियों को सही ठहराने का एक अवसर प्रदान करते हैं, जिससे उनकी जड़ें और गहरी होती हैं।
सूत्रों के अनुसार, इस मॉड्यूल की सक्रियता से कई लोगों की जान लेने में सक्षम होने के बावजूद, पुलिस और खुफिया एजेंसियों की सतर्कता ने एक बड़े खतरे को टाल दिया। यदि श्रीनगर पुलिस ने स्थानीय स्तर पर जैश-ए-मोहम्मद समर्थकों द्वारा लगाए गए पोस्टरों को गंभीरता से नहीं लिया होता, तो यह मॉड्यूल दिल्ली में लाल किले के पास कार धमाके और श्रीनगर के नौगाम थाने में हुए हमले जैसे विनाशकारी कृत्यों को अंजाम देने में सफल हो सकता था। इन दोनों घटनाओं में उसी विस्फोटक का प्रयोग किया गया था, जिसे फरीदाबाद मॉड्यूल ने जमा किया था।
श्रीनगर पुलिस की सक्रियता ने पहले कुछ पत्थरबाजों को पकड़ा, जिनसे पूछताछ के बाद एक ऐसे मौलवी तक पहुंचा गया जो जिहाद का पाठ पढ़ा रहा था। इसी कड़ी से फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ हुआ, जिसके पास से बड़ी मात्रा में विस्फोटक और घातक हथियार बरामद किए गए। यह घटना दर्शाती है कि स्थानीय स्तर पर मिली सूचनाएं और खुफिया एजेंसियों की तत्परता कैसे बड़े आतंकी हमलों को रोक सकती है।
यह भी सामने आया है कि फरीदाबाद का अल फलाह विश्वविद्यालय संदेह के घेरे में है, क्योंकि इसके कुछ डॉक्टर आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं। इनमें से दो डॉक्टर पहले जहां कार्यरत थे, वहां से बर्खास्त किए जा चुके थे – एक आतंकवाद को खुला समर्थन देने के आरोप में और दूसरा लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के कारण। यह सवाल उठता है कि अल फलाह यूनिवर्सिटी ने ऐसे संदिग्ध अतीत वाले डॉक्टरों को नियुक्ति क्यों दी? यदि डॉक्टर आतंकी बन जाएं और आसानी से किसी विश्वविद्यालय को अपना अड्डा बना लें, तो यह दर्शाता है कि जिहादी आतंक को खाद-पानी देने वाले तंत्र ने अपनी जड़ें बहुत गहरे तक जमा ली हैं।
विश्वविद्यालय के संचालन पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि इसके संस्थापक वाइस-चांसलर का भी आपराधिक रिकॉर्ड रहा है और वे धोखाधड़ी के मामले में जेल जा चुके हैं। इसके अलावा, विश्वविद्यालय में कश्मीरी डॉक्टरों की बड़ी संख्या में नियुक्ति भी चिंताजनक है। यह संभव है कि अल फलाह विश्वविद्यालय जिहादी इरादों वाले डॉक्टरों के लिए पसंदीदा स्थान बन गया हो, क्योंकि यहां उन्हें अपनी गतिविधियां चलाना आसान लगा हो। विश्वविद्यालय द्वारा राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नैक) की मान्यता का फर्जी दावा भी इस संदेह को पुष्ट करता है कि संस्थान का संचालन नियमों के अनुसार नहीं हो रहा था। निगरानी के अभाव में उच्च शिक्षा संस्थानों का आतंकियों के ठिकाने बनना एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चिंता का विषय है।
