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सस्ते कर्ज की जरूरत: निवेशकों का भरोसा जगाने का समय

By Nov 20, 2025

घरेलू बाजारों को गति देने और बैंकिंग प्रणाली को स्थिर करने के लिए किफायती कर्ज की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब ईएमआई घटती है, तो उपभोक्ताओं की खर्च योग्य आय बढ़ती है, जिससे घर और वाहनों की मांग में वृद्धि होती है। लंबे समय से धीमी बिक्री से जूझ रहे रियल एस्टेट क्षेत्र को भी ब्याज दरों में कटौती से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बीते अक्टूबर में खुदरा महंगाई घटकर पिछले दस वर्षों के न्यूनतम स्तर 0.25 प्रतिशत पर आ गई। थोक महंगाई भी 27 महीने के निचले स्तर पर दर्ज की गई। यह गिरावट मुख्य रूप से सब्जियों, फलों, अंडों, बिजली, परिवहन और संचार सेवाओं की कीमतों में कमी के कारण संभव हुई है। सितंबर से लागू जीएसटी दरों में कटौती का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान रहा है। क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर में शाकाहारी थाली 17 प्रतिशत और मांसाहारी थाली 12 प्रतिशत सस्ती हुई।

अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 में औसत खुदरा महंगाई घटकर 2.5 प्रतिशत पर स्थिर रह सकती है। इससे अगले महीने होने वाली भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में नीतिगत ब्याज दरों में कटौती की संभावना बढ़ गई है, ताकि अर्थव्यवस्था के विकास को नई गति मिल सके। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्टें भी रेखांकित कर रही हैं कि टैक्स और महंगाई में गिरावट से भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ रही है और देश की क्रेडिट रेटिंग सुधर रही है।

मूडीज की ग्लोबल मैक्रो आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, कम महंगाई और आर्थिक आधारभूत मजबूती के चलते भारत चालू वित्त वर्ष में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ जी-20 देशों में सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहेगा। मूडीज ने आरबीआइ की सतर्क मौद्रिक नीति की सराहना की है, जिसने वृद्धि और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखा है। हालांकि, निजी क्षेत्र अभी भी बड़े पैमाने पर निवेश को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं लग रहा है। ऐसे समय में, वैश्विक विकास दर में सुस्ती और अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी के बीच उद्योग-व्यापार के लिए सरल वित्त व्यवस्था की आवश्यकता और अधिक उभरकर सामने आई है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी की मध्य-वर्षीय समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि जीएसटी दरों में कटौती और महंगाई में कमी से भारतीय अर्थव्यवस्था को स्पष्ट लाभ हुआ है, किंतु वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं को देखते हुए उद्योग-व्यापार को वित्तीय समर्थन देना आवश्यक है। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट भी इस बात पर जोर देती है कि वर्ष 2047 तक भारत को 30,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए वित्तीय क्षेत्र में सुधार और आसान ब्याज दरों पर कर्ज उपलब्ध कराना अनिवार्य है।

आरबीआइ इस वर्ष रेपो दर में कुल एक प्रतिशत की कटौती कर चुका है, जिससे यह अब 5.5 प्रतिशत पर आ गई है। नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) भी घटाकर तीन प्रतिशत कर दिया गया है। फिर भी, मौजूदा वैश्विक चुनौतियों और भारतीय उद्योग-व्यापार की आवश्यकताओं को देखते हुए, ब्याज दरों में और कटौती समय की मांग है। वित्तीय संकेतक लगातार सुधार दिखा रहे हैं और विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजारों में निवेश बढ़ा रहे हैं। विश्व के कई केंद्रीय बैंक भी ब्याज दरों में कमी कर रहे हैं, जो भारत के लिए भी एक सकारात्मक संकेत है।

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