सरकार को अर्बन नक्सलियों से भी रहना होगा सतर्क, माओवाद उन्मूलन का लक्ष्य मार्च 2026 तक
दिल्ली में हाल ही में वायु प्रदूषण के खिलाफ एक प्रदर्शन ने एक अनपेक्षित मोड़ ले लिया, जब प्रदर्शनकारियों ने कथित पर्यावरण प्रेमियों के वेश में माओवादी सरगना हिड़मा के समर्थन में नारे लगाए। ‘माडवी हिड़मा अमर रहे’ जैसे नारे लगने से माओवाद के शहरी समर्थकों, जिन्हें ‘अर्बन नक्सल’ कहा जाता है, की सक्रियता उजागर हुई। जब पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो वे पेपर स्प्रे का इस्तेमाल करते हुए हिंसक हो गए, जिसके बाद 15 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया।
यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि माओवादी विचारधारा केवल दूरदराज के जंगलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शहरी बौद्धिक हलकों में भी अपनी पैठ बना चुकी है। ये ‘अर्बन नक्सल’ अक्सर खूंखार माओवादियों को आदिवासी समाज का हितचिंतक बताकर उनकी हिंसक गतिविधियों को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। यह भ्रामक प्रचार उन आदिवासियों के लिए भी खतरनाक साबित होता है जो माओवादी विचारधारा का समर्थन नहीं करते और क्रूरता का शिकार बनते हैं।
सुरक्षाबलों की बढ़ती सक्रियता और सरकार की दृढ़ प्रतिबद्धता के चलते माओवादी कैडर में भारी हड़कंप मचा हुआ है। इसका परिणाम यह है कि बड़ी संख्या में नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं। हाल के दिनों में बस्तर जिले में ही 2 करोड़ 8 लाख रुपये के इनामी 69 नक्सलियों ने हथियार डाले हैं, जिनमें पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से मार्च 2026 तक देश से माओवाद को समूल नष्ट करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए, सुरक्षाबलों ने हाल ही में छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के जंगलों में भी बड़ी सफलता हासिल की, जब डेढ़ करोड़ के इनामी बसव राजू समेत 27 माओवादियों को मार गिराया गया।
पूर्व में, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तब भी माओवादियों के खिलाफ कठोर नीति अपनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के विरोध के कारण उस अभियान को शिथिल करना पड़ा था। इसका फायदा उठाकर माओवादियों ने अपनी ताकत बढ़ाई और उनका दुस्साहस इतना बढ़ गया था कि किशनजी जैसे सरगना सुरक्षा बलों के हथियार डालने की शर्त पर वार्ता की बात करते थे।
हालांकि माओवादियों का तंत्र कमजोर हुआ है, लेकिन उनकी विचारधारा और शहरी समर्थकों के प्रभाव को कम नहीं आंका जा सकता। ये अर्बन नक्सल दुष्प्रचार फैलाकर सरकार के विकास एजेंडे को बाधित करने का प्रयास करते हैं, खासकर आदिवासियों की जमीन और संसाधनों को लेकर। इसलिए, जंगलों में छिपे माओवादियों के साथ-साथ इन शहरी समर्थकों से भी सतर्क रहना अत्यंत आवश्यक है ताकि माओवाद के पूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य हासिल किया जा सके।
बौद्धों पर हिंदू पर्सनल लॉ लागू होने के विरोध में SC ने विधि आयोग को भेजा मामला
वसंत विहार आत्महत्या केस में नया मोड़, पति-सास पर उकसाने का आरोप, एफआईआर दर्ज
अफगानिस्तान में भारत की मदद, पाक की कार्रवाई से बढ़ी तनातनी
भारतीय अर्थव्यवस्था ने भरी ऊंची उड़ान, GDP 8% के पार, उम्मीदों को दी मात
धनुष और कृति सनोन की ‘तेरे इश्क में’ एक मिश्रित अनुभव
बंगाल में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर TMC का विरोध, चुनाव आयोग से की मुलाकात
इंस्टाग्राम रील्स अब भारतीय भाषाओं में भी होंगी ट्रांसलेट, एडिटर ऐप में नए फॉन्ट्स
कर्नाटक में सत्ता संघर्ष: दिल्ली पहुंचा कांग्रेस का महाभारत
