सर्दी में बच्चों पर निमोनिया का कहर, इन लक्षणों को न करें नज़रअंदाज़
सर्दियों का मौसम शुरू होते ही बच्चों में निमोनिया का खतरा बढ़ गया है। विभिन्न अस्पतालों में निमोनिया से पीड़ित बच्चों की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है। सूत्रों के अनुसार, श्री कृष्ण चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल में हर रोज 20 से 25 बच्चे निमोनिया के कारण इलाज के लिए आ रहे हैं, जबकि सदर अस्पताल में यह संख्या 10 से 15 बताई जा रही है। कई अस्पतालों में बच्चों के लिए बने विशेष वार्डों में बिस्तर लगभग भर चुके हैं।
चिकित्सकों का कहना है कि ठंड के साथ-साथ बढ़ता प्रदूषण भी बच्चों के फेफड़ों को प्रभावित कर रहा है, जिससे उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही है। इसके अलावा, अस्थमा, सर्दी-जुकाम, बुखार और एलर्जी जैसी अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों से पीड़ित बच्चों की संख्या में भी इजाफा हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सर्दियों में श्वसन तंत्र से जुड़ी समस्याएं छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं में काफी बढ़ जाती हैं। सर्दी-खांसी जैसे सामान्य लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि यह निमोनिया का रूप ले सकता है, जो जानलेवा साबित हो सकता है।
डॉक्टरों ने बताया कि अगर निमोनिया से पीड़ित बच्चे को सांस लेने में गंभीर दिक्कत नहीं हो रही है, तो उसे दवाइयों से ठीक किया जा सकता है। इसमें बुखार और सर्दी-खांसी कम करने वाली दवाएं शामिल हैं। बच्चे की स्थिति के आधार पर एंटीबायोटिक्स भी दी जाती हैं। हल्के मामलों में नियमित फॉलो-अप बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि समय पर ध्यान न देने पर स्थिति बिगड़ सकती है।
गंभीर मामलों में बच्चों को अस्पताल में भर्ती कर गहन चिकित्सा की आवश्यकता होती है। निमोनिया का असर खासकर पांच साल से कम उम्र के बच्चों पर अधिक देखा जाता है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से फैलने वाले वायरस और बैक्टीरिया आसानी से छोटे बच्चों को अपनी चपेट में ले लेते हैं, जिससे उन्हें सांस लेने और दूध पीने में भी कठिनाई हो सकती है।
डॉक्टरों ने सलाह दी है कि यदि नवजात शिशु बीमार दिखे, दूध न पिए, सांस लेने में दिक्कत हो, सुस्त रहे, लगातार रोए या उसे बुखार हो, तो यह निमोनिया का संकेत हो सकता है। ऐसे में तत्काल चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। निमोनिया से बचाव के लिए छोटे बच्चों को संक्रमित लोगों से दूर रखना चाहिए। साथ ही, नवजात शिशु को मां का पहला गाढ़ा दूध (कोलेस्ट्रम) पिलाना चाहिए और छह महीने तक केवल स्तनपान कराना अत्यंत लाभदायक होता है।
