समयपूर्व रिहाई पर हाई कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला, सोनिया-संजीव की उम्मीदें अटकीं
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने पूर्व विधायक रेलू राम पुनिया हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रही उनकी बेटी सोनिया और दामाद संजीव कुमार की समयपूर्व रिहाई की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति हरप्रीत कौर जीवन की खंडपीठ ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई की। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद यह निर्णय लिया है और अब सभी को अदालत के फैसले का बेसब्री से इंतजार है।
यह मामला हरियाणा के बहुचर्चित रेलू राम पुनिया हत्याकांड से जुड़ा है। अगस्त 2001 में लितानी गांव के पास स्थित फार्म हाउस में पूर्व विधायक रेलू राम पूनिया सहित उनके परिवार के सात सदस्यों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में पूर्व विधायक, उनकी पत्नी, बच्चे, बहू और पोते-पोतियों की जान चली गई थी।
2004 में हिसार की अदालत ने इस मामले में संजीव और सोनिया को फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा। हालांकि, 2014 में दया याचिका दायर करने में हुई देरी का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था।
अपनी याचिका में, संजीव की ओर से यह दलील दी गई कि वह 20 साल से अधिक की वास्तविक सजा काट चुका है, और यदि छूट आदि को जोड़ा जाए तो यह अवधि 25 वर्ष 9 महीने से अधिक हो जाती है। इसी तरह, सोनिया भी 28 वर्ष से अधिक की सजा भुगत चुकी हैं। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि दोषी करार दिए जाने के समय लागू हरियाणा की समयपूर्व रिहाई नीति 2002 के तहत वे रिहाई के पात्र हैं।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ‘आखिरी सांस तक जेल’ जैसी सजा केवल संवैधानिक अदालत ही दे सकती है, कोई कार्यकारी समिति नहीं। याचिकाकर्ताओं ने 6 अगस्त 2024 के उस आदेश को भी चुनौती दी, जिसमें संजीव को ‘आख़िरी सांस तक जेल में रहने’ का निर्देश दिया गया था। उनकी दलील है कि स्टेट लेवल कमेटी ने उनकी जेल आचरण रिपोर्ट, शिक्षा, सुधारात्मक गतिविधियों और पुनर्वास कार्यक्रमों पर विचार नहीं किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने एक अन्य कैदी की रिहाई का उदाहरण देते हुए कहा कि जिसकी पृष्ठभूमि कहीं अधिक गंभीर थी और जिसने पैरोल की अवधि का उल्लंघन भी किया था, उसे रिहा कर दिया गया, जबकि उनकी याचिका खारिज कर दी गई। याचिकाकर्ताओं ने इसे स्पष्ट भेदभाव बताया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राज्य सरकार ने मामले को राज्यपाल के समक्ष रखने की संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया, जिससे यह आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाता है।
इन तमाम दलीलों को सुनने के बाद, हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जो इस मामले में अगले कदम की दिशा तय करेगा।
