समाजवादी विचारक सच्चिदानंद सिन्हा का निधन: बिहार के सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर
मुजफ्फरपुर, बिहार से एक दुखद खबर सामने आई है। समाजवादी विचारक सच्चिदानंद सिन्हा का निधन हो गया है। वे लंबे समय से बीमार थे। सिन्हा जी ने सामाजिक न्याय के लिए अपना जीवन समर्पित किया और कई आंदोलनों में सक्रिय रहे। उनके निधन से सामाजिक क्षेत्र में एक बड़ी क्षति हुई है।
सिन्हा जी ने कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘बिहार: द इंटरनल कॉलोनी’, ‘सोशलिज्म एंड पॉवर’, और ‘कयोज एंड क्रिएशन’ प्रमुख हैं। वे डॉ. लोहिया की पत्रिका ‘मैनकाइंड’ के भी संपादक रहे। सूत्रों के अनुसार, उनके निधन पर कई बड़े चिंतक, लेखक व समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े लोगों ने शोक व्यक्त किया है। इसे अपूरणीय क्षति बताया गया है।
योगेंद्र यादव ने अपनी एक पोस्ट के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा, ‘सच्चिदाजी नहीं रहे। भारतीय समाजवादी विचार परंपरा के एक युग का अवसान हो गया। मुझ जैसे ना जाने कितने युवाओं का वैचारिक प्रशिक्षण सच्चिदानंद सिन्हा को पढ़कर और सुनकर हुआ था।’
उन्होंने आगे कहा, ‘हिंदी और अंग्रेज़ी में दर्जनों किताबें, सैकड़ों लेख—अधिकांश बिहार के एक गांव में बैठकर लिखे गए। अर्थव्यवस्था से लेकर कला तक, गांधी से मार्क्स और नक्सलवाद तक। हमारे युग का कोई कोना सच्चिदाजी की कलम से ना छूटा। उम्मीद है अकादमिक जगत आने वाले समय में उनके आंतरिक उपनिवेशवाद के सिद्धांत, जाति व्यवस्था की नई व्याख्या, पूंजीवाद के पतझड़ के विश्लेषण और अन्य स्थापनाओं पर गौर करेगा।’
यादव ने अपनी श्रद्धांजलि में आगे कहा, ‘अलविदा सच्चिदाजी! मेरा सौभाग्य था कि आपका सानिध्य और आशीर्वाद मिला। सुखद संयोग था कि पिछले महीने मुजफ्फरपुर में आपसे मुलाक़ात हो पाई। आपकी नई नवेली दाढ़ी के पीछे चिर परिचित निश्छल मुस्कान और खिली हंसी संजो कर रखूंगा। अच्छा हुआ आपने मना करने पर भी आपके चरण छू सका।’
सिन्हा जी के निधन से बिहार के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में शोक की लहर है। उनके विचारों और योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। उनके द्वारा समाज के लिए किए गए कार्यों को आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के रूप में देखा जाएगा। उनके जाने से जो शून्यता आई है, उसे भरना मुश्किल होगा। उनके परिवार और प्रशंसकों के प्रति हमारी गहरी संवेदना है।
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