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अरवल में नशा मुक्ति केंद्र बना शोपीस, 9 साल में सिर्फ दो मरीज हुए भर्ती

By Nov 26, 2025

अरवल जिले में युवाओं के बीच नशे का प्रचलन चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है। शराबबंदी के बावजूद, युवा वर्ग स्मैक, गांजा, बोनफिक्स और सुलेशन जैसे नशीले पदार्थों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहा है। वहीं, खुलेआम शराब की बिक्री भी जारी है, जो इस समस्या को और गंभीर बना रही है।

नशा मुक्ति दिवस के अवसर पर स्कूली बच्चों के साथ प्रभात फेरी और सेमिनार जैसे आयोजनों पर लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। इन जागरूकता कार्यक्रमों का उद्देश्य नशे के खिलाफ लोगों को जागरूक करना है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। सरकारी खानापूर्ति के बीच, नशे के आदी लोगों के इलाज और उन्हें समाज की मुख्य धारा में वापस लाने की व्यवस्था चरमरा गई है।

जिले में नशे से प्रभावित लोगों के उपचार के लिए सदर अस्पताल में 10 बेड का नशा मुक्ति केंद्र वर्ष 2016 में खोला गया था। लेकिन, पिछले नौ वर्षों में इस केंद्र में मात्र दो मरीजों को ही भर्ती किया गया है। यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, खासकर तब जब प्रतिदिन एक दर्जन से अधिक नशे के शिकार मरीज अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचते हैं।

केंद्र में डॉक्टरों और अन्य आवश्यक कर्मियों की भारी कमी है। इस वजह से, नशा मुक्ति केंद्र में आने वाले मरीजों को केवल परामर्श देकर वापस भेज दिया जाता है। यदि किसी मरीज की हालत गंभीर हो जाती है, तो उन्हें इलाज के लिए पटना रेफर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। केंद्र में एक भी डॉक्टर की स्थायी तैनाती नहीं है, जिसके चलते यह सुविधा कागजों तक ही सीमित रह गई है।

नशा मुक्ति केंद्र के नोडल पदाधिकारी डॉ. अरविंद कुमार ने स्वीकार किया है कि चिकित्सकों के अभाव में मरीजों को केवल काउंसलिंग ही दी जा पाती है। उन्होंने यह भी बताया कि केंद्र में मरीज के इलाज के लिए आवश्यक 75 प्रतिशत दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन डॉक्टर के न होने से उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है। इलाज की समुचित व्यवस्था न होने के कारण, नशे के आदी लोग अब इस केंद्र का रुख नहीं करते हैं।

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