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रोहतास का ‘राइस मिल हब’ कंगाल: सरकारी नीतियों ने छीनी सैकड़ों की रोजी-रोटी

By Nov 22, 2025

बिहार के रोहतास जिले का नटवार क्षेत्र, जो कभी ‘उसना चावल राइस मिल हब’ के रूप में अपनी पहचान रखता था, आज सरकारी नीतियों की मार झेल रहा है। 2008 से पहले इस क्षेत्र में नौ बड़ी राइस मिलें और अनगिनत छोटी मिलें संचालित होती थीं, जो न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ थीं, बल्कि सैकड़ों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार भी प्रदान करती थीं। लेकिन, बदलते सरकारी नियमों और नीतियों के कारण ये सभी मिलें धीरे-धीरे बंद होने लगीं और आज खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं।

सूत्रों के अनुसार, प्रत्येक राइस मिल तीन से चार एकड़ जमीन पर बनी थी, जिनकी लागत डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक थी। इन मिलों में प्रत्यक्ष रूप से लगभग 100 लोगों को आठ महीने तक रोजगार मिलता था। इसके अलावा, धान खरीदने वाले छोटे व्यापारी, मजदूर, मिस्त्री और मिल के आसपास अन्य व्यवसाय करने वाले लोग भी अपनी आजीविका इसी उद्योग पर निर्भर थे। मिलों के बंद होने से इन सभी के सामने भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई है। कुछ संचालकों ने मिलों के कुछ कमरों को छोटे दुकानदारों को गोदाम के रूप में किराए पर दे दिया है, लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

मिल संचालकों का कहना है कि सरकार की नीतियों में बदलाव के कारण उसना चावल की मांग कम हो गई। पहले यहां से उत्पादित उसना चावल उत्तरी बिहार, झारखंड, बंगाल, भूटान और अन्य राज्यों में निर्यात होता था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। सरकार ने पैक्सों में अनुदानित ‘अरवा चावल मिल’ लगाने को प्रोत्साहित किया, जिससे ‘उसना चावल मिलों’ को और झटका लगा। पिछले दो-तीन वर्षों में बाजार की नई चुनौतियों से निपटने के लिए सिल्की और सोलटेक्स जैसी आधुनिक मशीनों से सुसज्जित कुछ बड़ी चावल मिलें लगी हैं, लेकिन वे ‘उसना चावल मिलों’ की जगह पूरी तरह से नहीं ले पाई हैं और न ही पहले जैसा रोजगार सृजित कर पा रही हैं।

एक मिल संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 2008 से पहले नटवार और नोखा क्षेत्र राइस मिलों का प्रमुख केंद्र था। यहां के उसना चावल की गुणवत्ता और मांग काफी अधिक थी। लेकिन, सरकारी उपेक्षा और गलत नीतियों ने इस संपन्न क्षेत्र को कंगाल बना दिया है। इससे न केवल स्थानीय लोगों की आजीविका छिन गई है, बल्कि बिहार की एक महत्वपूर्ण औद्योगिक पहचान भी धूमिल हुई है।

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