रोहतास का लुप्तप्राय कंबल उद्योग: 80 वर्षीय बुनकर निभा रहे परंपरा की आख़िरी डोर
रोहतास जिले के नासरीगंज नगर पंचायत के वार्ड संख्या 10 हरिहरगंज में स्थित ब्रिटिश कालीन बहुचर्चित स्माल स्केल इंडस्ट्री कंबल उद्योग आज सरकारी उदासीनता का शिकार होकर समाप्ति की ओर बढ़ चला है। कभी इस उद्योग की तूती बोलती थी और यह सैकड़ों लोगों के रोजगार का प्रमुख साधन था। 80 के दशक तक यहां दो दर्जन से अधिक करघे चलते थे, जिनमें तैयार होने वाले कंबल न केवल देश भर में, बल्कि विदेशों में भी निर्यात होते थे।
सूत्रों के अनुसार, देश की आजादी से पहले यहां के कंबल विशेष रूप से ब्रिटिश सेना को आपूर्ति किए जाते थे। उस समय उद्योग प्रबंधन महिलाओं को चरखा और कच्चा माल उपलब्ध कराता था, जिससे वे सूत कातकर अपनी आजीविका कमाती थीं। प्रत्येक दिन सैकड़ों की संख्या में कंबल तैयार होते थे, जिनकी मांग देश-विदेश में बनी रहती थी।
लेकिन 90 के दशक के बाद से इस उद्योग का पतन शुरू हो गया। पानीपत से आयात होने वाले मशीनों से बने फैंसी कंबलों ने इस पारंपरिक उद्योग को भारी झटका दिया है। आधुनिकता की चकाचौंध के आगे यह हुनरमंद उद्योग कहीं पीछे छूट गया।
आज, यह उद्योग मात्र एक परिवार तक सिमट कर रह गया है। 80 वर्षीय बुनकर दुलार चंद पाल, जो 70 के दशक से इस कार्य से जुड़े हैं, अपनी कमजोर उंगलियों से आज भी कंबल बुन रहे हैं। वे बताते हैं कि जब तक उनके शरीर में जान है, वे इस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास करते रहेंगे। वे मात्र 200 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी पर काम करते हैं।
उद्योग के विलुप्त होने से स्थानीय लोगों में बेरोजगारी बढ़ी है। पूर्व में इस उद्योग से जुड़े कई मजदूर पलायन कर चुके हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यह उद्योग पूर्व की तरह सक्रिय रहता तो युवाओं को यहीं रोजगार मिल पाता। सरकार के उदासीन रवैये के कारण यह महत्वपूर्ण पारंपरिक उद्योग हाशिये पर चला गया है। कंबल उद्योग के विलुप्त होने से न केवल सैकड़ों परिवारों के रोजगार छिन गए हैं, बल्कि एक अनमोल कला भी लुप्त होने के कगार पर है।
