रामलला का भव्य स्वागत: 500 साल के इंतजार के बाद भव्य मंदिर में विराजमान
अयोध्या नगरी आज एक ऐसे उत्सव में डूबी है, जिसका 500 साल से इंतजार था। तंबू की धूल और गर्मी से निकलकर रामलला अब अपने भव्य, राजमहल जैसे मंदिर में विराजमान हो चुके हैं। इस ऐतिहासिक पल के दो दिन बाद, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजा स्थापित करेंगे। यह केवल एक मंदिर का उद्घाटन नहीं, बल्कि सदियों की उस आग, अनगिनत मुकदमों और पीढ़ियों के इंतजार की परिणति है, जिसने इस भूमि को इतना खास बनाया है।
एक विशेष श्रृंखला का पहला अंक इस लंबी यात्रा की शुरुआत को दर्शाता है। कहानी उस आधी रात से शुरू होती है जब बाबर की फौज ने मंदिर पर हमला किया। उस विकट परिस्थिति में, पुजारियों ने साहस का परिचय देते हुए दीवारों को फांदकर रामलला की मूर्तियों को सुरक्षित बचाया। यह घटनाक्रम केवल एक क्षणिक विद्रोह नहीं था, बल्कि इसके पीछे इतिहास के कई पन्ने दबे हैं। 1853 में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरयू नदी ने तीन दिनों तक लाशें ढोईं।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह भी ज्ञात होता है कि निहंग सिखों ने मस्जिद के आंगन में ही एक चबूतरा बनाकर पूजा-अर्चना शुरू की। यह संघर्ष की एक और कड़ी थी। फिर आया 1885 का साल, जब महंत रघुबरदास ने मंदिर निर्माण के लिए पहला मुकदमा दायर कर कानूनी लड़ाई का बिगुल फूंका। यह एक ऐसी लड़ाई की शुरुआत थी जो दशकों तक चली और अंततः सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के साथ समाप्त हुई।
अयोध्या, जिसका अर्थ है ‘वह भूमि जिसे जीता न जा सके’, त्रेतायुग से ही पवित्रता और महत्व का केंद्र रही है। भगवान राम का जन्मस्थान, यह भूमि हमेशा से धर्म और न्याय की स्थापना का प्रतीक रही है। राजा दशरथ के पुत्र के रूप में राम का जन्म, विश्वामित्र के साथ राक्षसों का संहार, जनकपुरी में सीता का स्वयंवर, वनवास, रावण का वध और अंततः आदर्श राज्य की स्थापना – यह सब अयोध्या के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा है।
497 साल पहले, 15 सितंबर 1528 की आधी रात, इतिहास ने एक क्रूर मोड़ लिया। मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में प्रवेश किया और राम मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया। मंदिर के पुजारी उस समय की भयावहता को समझने की कोशिश कर रहे थे, जबकि बाहर मुगल सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी। मीर बाकी के शब्दों में, “ये जगह खाली करो। बादशाह बाबर का हुक्म है। ये बुतखाना अब यहां नहीं रहेगा।” यह आदेश एक ऐसे संघर्ष की शुरुआत थी जिसने भारत के इतिहास के पन्नों पर एक अमिट छाप छोड़ी और आज 500 साल के लंबे इंतजार के बाद, रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हुए हैं, जो न्याय, धैर्य और अटूट आस्था की जीत का प्रतीक है।
