पुतिन की भारत यात्रा: अमेरिका की बेचैनी और भारत-रूस व्यापार घाटे की चुनौती
रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के संभावित नतीजों का आकलन करना भले ही कठिन हो, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी इस यात्रा पर सारी दुनिया की निगाह होगी। सबसे अधिक निगाह अमेरिका और यूरोपीय देशों की होगी। निःसंदेह रूसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा पर चीन भी नजर रखेगा, क्योंकि यूक्रेन युद्ध के चलते रूस की उस पर निर्भरता बढ़ गई है। रूसी राष्ट्रपति एक ऐसे समय भारत आ रहे हैं, जब अमेरिका यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के लिए हाथ-पैर मार रहा है। इसके लिए वह रूस के साथ-साथ भारत पर भी दबाव बना रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारतीय आयात पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ इसीलिए थोप रखा है कि भारत रूस से तेल खरीद रहा है। जैसे अमेरिका की यह चाहत है कि भारत रूस से तेल खरीद बंद कर दे, वैसे ही यूरोपीय देश भी यह चाहते हैं कि भारत रूस से दूरी बनाकर रखे। कुछ यूरोपीय देशों ने तो भारत को रूस की निकटता से आगाह भी किया है। यह बात और है कि वे स्वयं रूस से ऊर्जा की आपूर्ति कर रहे हैं। यह तो तय है कि भारत रूस से अपने संबंधों को आगे बढ़ाने के क्रम में अमेरिका और यूरोपीय देशों की चिंताओं की अधिक परवाह नहीं करने वाला, लेकिन इस तथ्य की अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि उसे अमेरिका के दबाव में रूस से तेल खरीद में कटौती करनी पड़ी है। स्पष्ट है कि भारत और रूस, दोनों के ही सामने यह चुनौती है कि तेल खरीद के मामले में अमेरिका के अनुचित दबाव का प्रतिकार कैसे किया जाए। भारत को यह प्रतिकार करते समय इसका ध्यान रखना होगा कि इससे अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार समझौते में कोई बाधा न खड़ी होने पाए।
चूंकि रूसी राष्ट्रपति अपने कई मंत्रियों के साथ भारत आ रहे हैं और वे दो दिन प्रवास करेंगे, इसलिए यह तो स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में बड़े समझौते होने वाले हैं। ये समझौते दोनों देशों को और निकट लाने का काम करेंगे, लेकिन भारत को एक ओर जहां यह ध्यान रखना होगा कि वह अपनी रक्षा जरूरतों पर एक सीमा से अधिक रूस पर निर्भर न होने पाए, वहीं दूसरी ओर उसे उसके साथ अपने व्यापार घाटे में कमी लाने के उपाय भी करने होंगे। यह ठीक है कि दोनों देश आपसी व्यापार को सौ अरब डालर तक ले जाना चाहते हैं, लेकिन यह ठीक नहीं कि भारत का रूस से आयात लगभग 65 अरब डालर का है, जबकि उसे निर्यात पांच अरब डालर ही है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि भारत ऐसी वस्तुओं का निर्माण करने में सक्षम नहीं, जिनकी रूस को जरूरत है। वास्तव में यह भारत की एक बड़ी कमजोरी है कि उसके पास ऐसे उत्पाद नहीं, जिनके बगैर दूसरे देशों का काम न चल सके। भारत को अपनी इस कमजोरी को प्राथमिकता के आधार पर दूर करना होगा।
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