एडेड डिग्री कॉलेजों में प्राचार्य भर्ती: 298 में से 100 बचे, UP में ‘प्रिंसिपल क्राइसिस’ की दस्तक
उत्तर प्रदेश के अशासकीय सहायता प्राप्त (एडेड) डिग्री कॉलेजों में प्राचार्य पद पर नियुक्त हुए शिक्षकों के नौकरी छोड़कर अपने पुराने संस्थानों में लौटने की प्रवृत्ति चिंताजनक रूप ले रही है। अक्टूबर 2020 में 298 प्राचार्यों की भर्ती हुई थी, लेकिन अब केवल 100 ही अपने पद पर बने हुए हैं। इसके चलते अधिकांश कॉलेज कार्यवाहक प्राचार्यों के भरोसे चलाए जा रहे हैं।
यह स्थिति नवंबर 2021 में कॉलेजों में प्रोफेसर पद के सृजन के बाद उत्पन्न हुई, जो प्राचार्य पद के समकक्ष था। इससे प्राचार्य बने शिक्षकों को कोई अतिरिक्त आर्थिक लाभ नहीं मिला, जबकि प्रबंधतंत्र के अधीन रहकर उन्हें अधिक झंझटें झेलनी पड़ीं। आगरा कॉलेज, मेरठ कॉलेज और लखनऊ के डीएवी व केकेवी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से भी प्राचार्य अपने पुराने प्रोफेसर पद पर लौट गए। कई मामलों में प्रबंधतंत्र के साथ तालमेल न बैठ पाने के कारण भी शिक्षकों ने प्राचार्य का पद छोड़ दिया।
भविष्य की भर्ती पर अनिश्चितता
उत्तर प्रदेश शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. मौलिंदु मिश्रा के अनुसार, यदि अर्हता पूरी करने वाले सबसे कम उम्र के शिक्षकों को प्राचार्य बनाया जाए तो वे पद पर बने रह सकते हैं। सेवानिवृत्ति के करीब वाले शिक्षक अनावश्यक झंझटों में नहीं पड़ना चाहते। उच्च शिक्षा विभाग इस समस्या के समाधान के लिए विचार-विमर्श कर रहा है। 2020 की भर्ती पुराने नियमों के तहत हुई थी, जिसमें पांच साल का कार्यकाल अनिवार्य नहीं था। अब नई नियुक्तियां यूजीसी के नए नियमों के तहत होंगी, जिनमें पांच साल का कार्यकाल और विस्तार का प्रावधान है। इससे भविष्य में प्राचार्य पद भरना और भी कठिन हो सकता है।
प्रबंधतंत्र और वरिष्ठता का मुद्दा
लुआक्टा के अध्यक्ष डॉ. मनोज पांडेय का सुझाव है कि प्राचार्य पद को वरिष्ठता के आधार पर रोटेशन से भरा जाए, जिससे बार-बार आयोग को परीक्षा नहीं करानी पड़ेगी। वर्तमान में, 331 एडेड डिग्री कॉलेजों में से अधिकांश में नियमित प्राचार्य नहीं हैं। प्रबंधतंत्र भी अक्सर अपने कॉलेज के वरिष्ठ शिक्षकों को ही प्राचार्य बनाना पसंद करते हैं, जिससे बाहरी नियुक्तियों में विवाद की स्थिति बनती है। पहले प्राचार्यों को मिलने वाली बंगला और गाड़ी जैसी सुविधाएं भी अब समाप्त हो गई हैं, जिससे पद की आकर्षण क्षमता कम हुई है। प्रशासनिक पद पर होने के कारण जांच की तलवार भी लटकती रहती है, और प्रबंधतंत्र के साथ अनबन होने पर टिकना मुश्किल हो जाता है। कुछ कॉलेजों में आपसी गुटबाजी के कारण भी बाहरी प्राचार्यों को टिकने नहीं दिया गया। इन सब कारणों से शिक्षक अब प्राचार्य पद पर तनाव अधिक और लाभ कम देख रहे हैं।
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