भागलपुर में कीटनाशक का जहर: जलस्रोतों में मछलियों के अस्तित्व पर मंडराया संकट, जानिए क्या है पूरा मामला
भागलपुर के खेतों में फसलों को बचाने के लिए इस्तेमाल हो रहे रासायनिक कीटनाशक अब तालाबों और जलस्रोतों के जरिए जलीय जीवन के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) के प्राणी विज्ञान विभाग में किए गए एक शोध में खुलासा हुआ है कि आम तौर पर प्रयोग होने वाला कीटनाशक लैम्ब्डा-सायहेलोथ्रिन मीठे पानी की मछलियों के स्वास्थ्य और अस्तित्व को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
यह अध्ययन टीएमबीयू के शोधार्थी गौरव कुमार ने सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नवोदिता प्रियदर्शनी के निर्देशन में किया। अध्ययन के लिए स्थानीय जलाशयों में पाई जाने वाली मछली एनाबस टेस्टुडिनियस (क्लाइम्बिंग पर्च) को चुना गया। मछलियों का संग्रह जिले के बिहपुर और नारायणपुर प्रखंड के कृषि प्रधान इलाकों के तालाबों से किया गया, जबकि कीटनाशक स्थानीय बाजार से लिया गया।
शोध में सामने आया कि कीटनाशक की बहुत कम मात्रा के संपर्क में आने से ही मछलियों में खून की कमी, यकृत और अन्य आंतरिक अंगों को नुकसान तथा प्रतिरक्षा प्रणाली में कमजोरी देखी गई। इसके अलावा, मछलियों के एंजाइम तंत्र में बदलाव से उनका सामान्य विकास और जीवन चक्र प्रभावित हुआ।
लंबे समय तक संपर्क में रहने पर मछलियों की मृत्यु दर बढ़ने की बात भी संभावना शोध में दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका असर केवल मछलियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे पूरा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है।
भोजन श्रृंखला प्रभावित होने से मानव स्वास्थ्य और स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर भी खतरा बढ़ सकता है। शोध में यह भी संकेत मिला है कि यह कीटनाशक जलीय कीटों, परागण करने वाले कीटों और मिट्टी के लाभकारी जीवों को भी नुकसान पहुंचाता है। मानव स्वास्थ्य पर इसके दुष्प्रभाव के रूप में त्वचा व आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी और चक्कर जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
इस शोध के निष्कर्ष कृषि में कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग पर नियंत्रण की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। किसानों को जैविक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों के प्रति जागरूक करने की जरूरत है, ताकि विकास की दौड़ में पर्यावरण संरक्षण की अनदेखी भविष्य के लिए घातक साबित न हो।
