पुतिन की पहली भारत यात्रा: जब परमाणु शक्ति और कूटनीति ने बुनी नई राह
साल 2000, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के कुछ महीनों बाद, दिसंबर में रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नई दिल्ली में कदम रखा। यह यात्रा न केवल भारत और रूस के बीच पुराने, विश्वासपात्र संबंधों में नई जान फूंकने के लिए थी, बल्कि इसे एक ‘रणनीतिक साझेदारी’ में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी था।
उस समय, रूस सोवियत संघ के विघटन के बाद अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद में था, वहीं भारत भी अपनी विदेश नीति को नए सिरे से गढ़ रहा था और परमाणु परीक्षणों के बाद लगे प्रतिबंधों से जूझ रहा था। ऐसे समय में, 47 वर्षीय पुतिन, जो कुछ महीने पहले ही रूसी राष्ट्रपति बने थे, की यह पहली भारत यात्रा अत्यंत महत्वपूर्ण थी। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में, दोनों देशों ने इस ऐतिहासिक साझेदारी को नया आयाम देने का निर्णय लिया।
पुतिन की यात्रा को ‘नमस्ते’ और आगरा के ताजमहल के भ्रमण ने यादगार बना दिया। संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने संबोधन में, पुतिन ने भारत के प्रति प्रशंसा व्यक्त करते हुए कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी सकारात्मक संकेत दिए। तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने रूस को ‘जरूरत के समय का दोस्त’ बताते हुए संबंधों की गहराई को रेखांकित किया।
इस यात्रा के दौरान, रक्षा क्षेत्र में टी-90 टैंक और सुखोई-30 लड़ाकू विमानों जैसे बड़े सौदों पर सहमति बनी। व्यापारिक तंत्रों को मजबूत किया गया और एक औपचारिक रणनीतिक साझेदारी की नींव रखी गई। पुतिन ने मुंबई का दौरा किया और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) का भी अवलोकन किया, जिसे भारत की परमाणु क्षमताओं के प्रति एक मौन स्वीकृति के रूप में देखा गया।
आज, 25 साल बाद, जब पुतिन एक बार फिर भारत की राजकीय यात्रा पर हैं, उनकी 2000 की पहली यात्रा का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह वही यात्रा थी जिसने भारत और रूस के बीच स्थायी संबंधों की नींव रखी। भले ही वैश्विक परिदृश्य बदल गया हो, लेकिन रूस आज भी भारत के लिए एक ‘स्वाभाविक सहयोगी’ बना हुआ है, जैसा कि बोरिस येल्तसिन ने 1990 के दशक में कहा था। पुतिन की यह प्रारंभिक यात्रा indo-russia कूटनीति का एक मील का पत्थर है, जिसने भविष्य के लिए एक मजबूत और स्थिर साझेदारी का मार्ग प्रशस्त किया।
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