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पुतिन की भारत यात्रा: अमेरिका की बढ़ती चिंता, द्विपक्षीय रिश्तों में दरार?

By Dec 4, 2025

पिछले दो दशकों से अधिक समय से भारत और अमेरिका के बीच विकसित हुए मजबूत सामरिक तालमेल पर अब अविश्वास, व्यापार युद्ध और भू-राजनीतिक दबावों की परतें चढ़ने लगी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संबंधों में यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी की है। भारत के इस कदम ने अमेरिकी राजनीतिक हलकों में स्पष्ट रूप से असहजता पैदा की है।

सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (सीनैस) में आयोजित एक चर्चा के दौरान, विशेषज्ञों ने कहा कि पिछले ढाई दशक से दोनों देशों ने मिलकर चीन के प्रभाव को नियंत्रित करने के उद्देश्य से अपने संबंधों को मजबूत करने में लगातार निवेश किया था। हालाँकि, अब स्थिति बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है। सीनैस में हिंद-प्रशांत सुरक्षा कार्यक्रम की निदेशक और वरिष्ठ फेलो लीजा कर्टिस के अनुसार, दोनों देशों के संबंध पिछले 25 वर्षों में सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे माहौल में मोदी-पुतिन की मुलाकात ‘वाशिंगटन के लिए गलत समय’ पर होती हुई दिख रही है, लेकिन यह भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को प्रदर्शित करने वाला एक स्वाभाविक कदम भी है।

उन्होंने आगे कहा कि पुतिन के साथ मुलाकात के माध्यम से भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका से डरने वाला नहीं है। ओआरएफ अमेरिका की लिडसे फोर्ड का मानना है कि दोनों देशों में अब ऐसे राजनीतिक नेता कम रह गए हैं जो व्यक्तिगत स्तर पर रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करते थे। फोर्ड के अनुसार, अमेरिका-भारत साझेदारी कभी भी स्वाभाविक या आसान नहीं रही है। चीन के बढ़ते प्रभाव से उत्पन्न दीर्घकालिक खतरा अभी भी दोनों देशों को करीब लाने का मुख्य कारण बना हुआ है, लेकिन इसके लिए आपसी विश्वास को बहाल करना अत्यंत आवश्यक है।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की तन्वी मदान ने भारत की रूस और चीन के साथ मौजूदा कूटनीतिक गतिविधियों को किसी ‘नई धुरी’ की शुरुआत मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि यह भारत की पुरानी ‘विविधतापूर्ण रणनीति’ का ही हिस्सा है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मास्को के पाकिस्तान और चीन के साथ बढ़ते संबंधों को देखते हुए रूस-भारत संबंधों की अपनी सीमाएं हैं। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, अमेरिका के साथ रक्षा अभ्यासों और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में कार्यात्मक साझेदारी अभी भी बनी हुई है।

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