पतंजलि गुरुकुलम: दिव्य चरित्र और नेतृत्व की नई पौध तैयार करने का अभियान
योगगुरु स्वामी रामदेव ने हाल ही में आचार्यकुलम यूनिवर्सिटी, जिसे पतंजलि गुरुकुलम के नाम से भी जाना जाता है, का विस्तृत भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने वहां अध्ययनरत छात्रों से संवाद किया और गुरुकुलम में शिक्षा के स्वरूप को करीब से जाना। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि किस प्रकार यह संस्थान प्राचीन गुरुकुल परंपरा और आधुनिक शिक्षा का एक अनूठा संगम प्रस्तुत कर रहा है, जहाँ ऋषि-ऋषिकाओं के योग्य उत्तराधिकारी तैयार किए जा रहे हैं।
पतंजलि गुरुकुलम का मूल उद्देश्य केवल अकादमिक डिग्री प्रदान करना नहीं है, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना है जो ज्ञान, संस्कार, स्वास्थ्य और नेतृत्व के चारों स्तंभों पर खरे उतरें। यहाँ छात्रों को वेद, उपनिषद, संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ-साथ विज्ञान, तकनीक और गणित जैसे आधुनिक विषयों का भी गहन ज्ञान दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, 10 से अधिक भाषाओं और 100 से अधिक दक्षताओं को सिखाने पर भी ध्यान केंद्रित किया जाता है। स्वामी रामदेव के अनुसार, आज भारत को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें और साथ ही आधुनिक विश्व की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकें।
स्वामी रामदेव ने भ्रमण के दौरान छात्रों से योग, ध्यान और प्राणायाम के नियमित अभ्यास के बारे में जानकारी ली। उन्होंने बताया कि गुरुकुलम का जीवन केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां का अनुशासन, दिनचर्या और वातावरण छात्रों के सर्वांगीण व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग और आयुर्वेद यहां की शिक्षा प्रणाली के अभिन्न अंग हैं। छात्र प्रतिदिन योगाभ्यास करते हैं, जिससे उनकी एकाग्रता और मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है। उनके भोजन में भी सात्त्विक और स्वास्थ्यवर्धक पदार्थों को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि उनका शरीर और मन दोनों स्वस्थ एवं शुद्ध रहें।
स्वामी रामदेव ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की अगली पीढ़ी को केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता, नवोन्मेषी विचारक और संवेदनशील नागरिक बनना होगा। गुरुकुलम में छात्रों को नेतृत्व क्षमता विकसित करने, सामाजिक सेवा, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रनिर्माण जैसे कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। उन्होंने ‘दिव्य नेतृत्व’ के महत्व को समझाते हुए कहा कि इसका अर्थ है सत्य और नैतिकता पर आधारित निर्णय लेना, समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना, आध्यात्मिक दृष्टि रखना, ज्ञान के साथ-साथ करुणा का भाव रखना और संस्कारों को ही असली धन मानना।
उन्होंने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि डिग्री महत्वपूर्ण है, परंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण संस्कार, चरित्र और आत्मबल हैं। चाहे गुरुकुलम के छात्र भविष्य में डॉक्टर, वैज्ञानिक, प्रशासक या संन्यासी बनें, उनका अंतिम लक्ष्य समाज और राष्ट्र की सेवा होना चाहिए। पतंजलि गुरुकुलम आज केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। यहाँ यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि भारत की आने वाली पीढ़ियाँ न केवल वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी गहराई से जुड़ी रहें। स्वामी रामदेव का स्पष्ट संदेश है कि ‘दिव्य व्यक्तित्व, दिव्य चरित्र और दिव्य नेतृत्व के साथ ही भारत पुनः विश्वगुरु बन सकता है।’
