0

पीड़िया पर्व: भाई-बहन के अटूट प्रेम और सांस्कृतिक एकता का अनूठा संगम

By Nov 18, 2025

भोजपुरी अंचल की लोकजीवन, आस्था और पारिवारिक परंपराओं की समृद्ध विरासत को उजागर करने वाला अनुपम पर्व ‘पीड़िया’ भाई-बहन के पवित्र रिश्ते, पारिवारिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक माना जाता है। रक्षाबंधन और भाई-दूज की तरह इस पर्व को भी समान श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष अगहन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को पड़ने वाला यह पर्व मनाया जाएगा, जिसके लिए गांवों से लेकर बाजारों तक पूजन सामग्री, पारंपरिक वस्तुओं और सजावट की खरीदारी तेज हो गई है।

भोजपुरी समाज में पीड़िया व्रत को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे जीवन-मूल्यों और पारिवारिक संस्कारों से गहराई से जोड़ा गया है। इस दिन बहनें भगवान विष्णु और कुलदेवता का विशेष पूजन करती हैं, जिसमें भाई की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और हर प्रकार के संकट से रक्षा की कामना की जाती है। पूजा में मिट्टी के पात्र, चावल, दीया, माला और पारंपरिक व्यंजनों का विशेष महत्व होता है। कथा-श्रवण और दीपदान भी इस दिन की प्रमुख धार्मिक विधियों में शामिल हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पीड़िया व्रत की शुरुआत गोवर्धन पूजा के दिन दीवारों पर गोबर से ‘पीड़िया’ बनाने से होती है, जो लगभग सवा माह तक चलता है। इसके बाद अगहन की प्रथम तिथि को बहनें उपवास रखती हैं और द्वितीया को भाई के साथ गंगा नदी या किसी तालाब में विधि-विधान से पीड़िया का विसर्जन करती हैं। यह विसर्जन भाई के जीवन से समस्त बाधाओं और कष्टों को दूर करने का प्रतीक माना जाता है।

इस व्रत की एक खास परंपरा ‘सोहरिया’ है, जिसमें भाई की संख्या के अनुसार 16 धानों से पूजन किया जाता है। बहनें विशेष रूप से चावल और सोहरिया की खीर बनाकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करती हैं, जो इस पर्व की मिठास को और बढ़ा देता है। यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह पीढ़ियों से चले आ रहे पारिवारिक रिश्तों और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करता है।

About

Journalist covering latest updates.

साझा करें