उपभोक्ता परिषद की मांग: बिजली निजीकरण रोकें, नई दरें जल्द घोषित हों
लखनऊ। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने नियामक आयोग में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव दाखिल कर वर्ष 2025-26 के लिए बिजली दरों की घोषणा जल्द से जल्द करने की पुरजोर मांग की है। इसके साथ ही, परिषद ने बिजली के निजीकरण के प्रस्ताव पर कड़ा एतराज जताते हुए उसे तत्काल खारिज करने की भी मांग की है। परिषद का मुख्य तर्क यह है कि नई बिजली दरों के घोषित होने से सभी वित्तीय आंकड़े पूरी तरह बदल जाएंगे। ऐसे में, पुराने और अब अप्रासंगिक हो चुके आंकड़ों के आधार पर निजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।nnपरिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने सोमवार को आयोग में दाखिल अपने प्रस्ताव के माध्यम से इस मामले पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बिहार चुनाव संपन्न होते ही पावर कारपोरेशन प्रबंधन निजीकरण के लिए टेंडर निकालने की तैयारी में जुट गया है। यह प्रस्ताव पिछले पांच महीनों से लंबित है, और नियामक आयोग द्वारा पूछे गए महत्वपूर्ण सवालों पर सरकार की ओर से अब तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया है। वर्मा के अनुसार, यह स्थिति निजीकरण के प्रस्ताव को खारिज करने का एक मजबूत आधार प्रदान करती है। अब जब नई बिजली दरें घोषित होने वाली हैं, तो पुराने वित्तीय आंकड़े स्वतः ही अप्रासंगिक हो जाएंगे।nnपरिषद ने यह भी बताया कि सभी विद्युत वितरण निगमों ने अपनी वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर) पहले ही आयोग को जमा कर दी है। इसके अलावा, जनसुनवाई और राज्य सलाहकार समिति की बैठक सहित सभी आवश्यक नियामकीय प्रक्रियाएं भी पूरी की जा चुकी हैं। विद्युत अधिनियम-2003 के तहत निर्धारित 120 दिनों की अनिवार्य अवधि भी समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद वर्ष 2025-26 के लिए बिजली दरें अभी तक घोषित नहीं की गई हैं।nnनिजीकरण के मसौदे में पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के तहत आने वाले 42 जिलों के लिए मात्र 6500 करोड़ रुपये का रिजर्व प्राइस रखा गया था, जिसे परिषद ने अत्यंत कम बताया है। परिषद का मानना है कि इन महत्वपूर्ण बिजली कंपनियों की परिसंपत्तियों को निजी घरानों को औने-पौने दाम में सौंपने का प्रयास किया जा रहा है। पुराने आंकड़ों के आधार पर निजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना न केवल तर्कहीन है, बल्कि यह अवैधानिक और उपभोक्ता-विरोधी भी है।nnदूसरी ओर, विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने भी इस मुद्दे पर अपनी कड़ी आपत्ति जताई है। समिति ने घाटे के गलत आंकड़ों के आधार पर पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण का आरोप लगाया है। उन्होंने मुख्य सचिव से निजीकरण के रिक्वेस्ट फार प्रपोजल (आरएफपी) डॉक्यूमेंट को मंजूरी न देने की अपील की है। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि निजीकरण का टेंडर प्रकाशित होता है, तो प्रदेश के बिजलीकर्मी सामूहिक जेल भरो आंदोलन शुरू कर देंगे। समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि प्रबंधन जल्दबाजी में टेंडर निकालने की तैयारी में है, जबकि पावर कारपोरेशन के अध्यक्ष ने मुंबई में एक बैठक के दौरान पत्रकारों को इस संबंध में जानकारी दी थी।”
संकेत दिए थे।
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