विपक्षी दलों की हार का ठीकरा: एसआईआर पर अनावश्यक आपत्ति और ईवीएम पर संदेह क्यों?
वास्तव में, कांग्रेस नेतृत्व सहित अधिकांश विपक्षी दल अपनी मूल समस्याओं को देखने और समझने की क्षमता खो चुके हैं। उनका अहंकार और वंशवादी अधिकारबोध उन्हें आत्म-विश्लेषण से वंचित कर रहा है। वे कल्पना की दुनिया में जी रहे हैं और वास्तविकता से पूरी तरह कट चुके हैं, अपनी हर चुनावी असफलता के लिए प्रधानमंत्री मोदी और चुनाव आयोग पर बेबुनियाद आरोप मढ़ रहे हैं।
भारत का लोकतंत्र विश्व की सबसे विशाल जनइच्छा का प्रतिबिंब है, जहां चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि एक पवित्र राष्ट्रीय संस्कार है। एक-एक मत स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था की धड़कन है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना केवल निर्वाचन आयोग का प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक आत्मा की सुरक्षा का भी प्रश्न है। इसी मूल भावना के साथ चुनाव आयोग ने इस वर्ष 1 जुलाई से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का व्यापक अभियान शुरू किया, ताकि कोई अपात्र व्यक्ति सूची में शामिल न हो और कोई पात्र नागरिक छूट न जाए।
यह विडंबना है कि कुछ राजनीतिक दल, जो संविधान की प्रतियां लहराकर स्वयं को उसके ‘रक्षक’ साबित करने पर तुले रहते हैं, वही संसद के भीतर और बाहर इस वैधानिक चुनाव सुधार प्रक्रिया पर अनर्गल सवाल खड़े कर रहे हैं। देशव्यापी एसआईआर के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में भी मामले दायर किए गए, जिनकी पैरवी कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे दिग्गज वकीलों ने की। उनकी दलील थी कि एसआईआर एक गैर-जरूरी प्रक्रिया है और चुनाव आयोग के पास इसे कराने का अधिकार नहीं है, जिसे अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि बिहार में एसआईआर के दौरान हटाए गए किसी भी अपात्र मतदाता ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई।
चुनाव आयोग अब 12 राज्यों के 321 जिलों में लगभग 51 करोड़ मतदाताओं की समीक्षा कर रहा है। तीन दिसंबर तक 99 प्रतिशत से अधिक फॉर्म वितरित और 93 प्रतिशत से अधिक डिजिटाइज किए जा चुके हैं। स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए आयोग ने 4,700 से अधिक सर्वदलीय बैठकों का आयोजन किया, जिसमें 28,000 राजनीतिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। अंतिम मतदाता सूची 16 फरवरी को प्रकाशित होगी और जिन लोगों के नाम सूची से हटेंगे, उन्हें एक माह तक दावा-आपत्ति का अवसर मिलेगा। इतनी पारदर्शी प्रक्रिया से घबराहट कैसी? विरोधियों द्वारा पहले ईवीएम पर संदेह जताना, वोट चोरी का आरोप मढ़ना और अब एसआईआर का विरोध करना असल में ‘नाच न जाने, आंगन टेढ़ा’ वाली कहावत को चरितार्थ करने जैसा है।
लोकसभा चुनाव में मामूली सफलता के बाद से कांग्रेस को एक के बाद एक राज्यों में मुंह की खानी पड़ी है। कांग्रेस का यह क्षरण बिहार चुनाव तक कायम रहा, मगर वह आत्ममंथन के बजाय आरोप-प्रत्यारोप में लगी है। स्वतंत्रता के बाद देश पर कांग्रेस का 50 वर्षों तक प्रत्यक्ष-परोक्ष शासन रहा, लेकिन अब वह कई राज्यों में अपने दम पर सत्ता में लौटने में असमर्थ है। दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण राज्य में तो वह पिछले तीन चुनावों में खाता तक नहीं खोल पाई।
पिछले चार लोकसभा चुनाव भारत के बदलते राजनीतिक परिदृश्य को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। जहां 2009 में भाजपा को 18.8 प्रतिशत मत और 116 सीटें मिली थीं, वहीं 2014 में वह 31 प्रतिशत मतों के साथ 282 सीटों पर पहुंच गई, जबकि कांग्रेस 206 से घटकर 44 सीटों पर आ गई। 2019 में भाजपा का जनसमर्थन और प्रबल हुआ और उसने 37.3 प्रतिशत मतों और 303 सीटों के साथ फिर बहुमत प्राप्त किया। 2024 के चुनाव में भी, पीएम मोदी के नेतृत्व में, भाजपा ने सीटें (240) और मत (36.5 प्रतिशत) घटने के बावजूद सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की, जो विपक्षी दलों की रणनीति की कमजोरी को उजागर करता है।
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