बिहार के सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत और बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा संकट | bihar school reality check
बिहार के सरकारी विद्यालयों की प्रशासनिक सुस्ती और जर्जर बुनियादी ढांचे ने एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। राज्य के विभिन्न जिलों में सामने आए हालिया मामलों से स्पष्ट होता है कि कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा अंतर है। खगड़िया में एक मासूम बच्ची की अकाल मौत के बाद भी शिक्षा विभाग की कुंभकर्णी नींद नहीं टूटी है, और बच्चे आज भी जान जोखिम में डालकर शिक्षा ग्रहण करने को विवश हैं।
दरभंगा से छपरा तक एक जैसे हालात
राज्य के दरभंगा जिले के कीरतपुर स्थित एक प्राथमिक विद्यालय में स्थिति इतनी भयावह है कि स्कूल का एक मुख्य पिलर महीनों पहले जवाब दे चुका है। छत को किसी तरह ईंटों और बेंचों के सहारे टिकाया गया है, ताकि कोई बड़ा हादसा न हो। बच्चे या तो बाहर टीन शेड के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं या फिर मौत के साए में क्लास ले रहे हैं। प्रधानाध्यापक द्वारा कई बार जिला और प्रखंड स्तर के अधिकारियों को लिखित सूचना देने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। कमोबेश यही हाल छपरा, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और बेगूसराय का भी है, जहां टूटी छतें और जर्जर दीवारें किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही हैं।
सरकारी दावे और जमीनी हकीकत
इस गंभीर मुद्दे पर सियासत भी तेज है और जनप्रतिनिधियों ने भी विधानसभा से लेकर सार्वजनिक मंचों तक इन समस्याओं को उठाया है। सरकार की ओर से स्कूलों के कायाकल्प के लिए बड़े-बड़े बजट और अभियानों की घोषणाएं की जा रही हैं, लेकिन धरातल पर सुस्ती साफ देखी जा सकती है। जब तक कागजी योजनाओं को अमलीजामा पहनाकर युद्ध स्तर पर स्कूलों के जीर्णोद्धार का काम शुरू नहीं किया जाता, तब तक मासूमों का भविष्य इसी तरह अनिश्चितता के साये में जीता रहेगा।
