साकेत कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले की दिल्ली हाईकोर्ट ने की सराहना | delhi news
राजधानी दिल्ली की न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता और कड़े कानून का एक अनूठा उदाहरण सामने आया है। साकेत सेशन कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट से जुड़े एक गंभीर मामले में सुनवाई पूरी करते हुए दोषी सुमित शाह को ताउम्र सलाखों के पीछे रहने की सजा सुनाई है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि दोषी को अपने जीवन के अंतिम क्षण तक जेल में ही बिताने होंगे और उसे किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी जाएगी। इस फैसले ने समाज को यह कड़ा संदेश दिया है कि जघन्य अपराधों में न्याय सुनिश्चित करने के साथ पीड़ित के पुनर्वास पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
फैसला सुनाने के दौरान साकेत कोर्ट की जज रजनी रंगा ने कानूनी औपचारिकताओं से परे जाकर पीड़िता के नाम एक विशेष पत्र लिखा। इस मार्मिक संदेश में उन्होंने बच्ची को संबोधित करते हुए लिखा कि वह बिना किसी डर के अपना जीवन जिए, स्कूल जाए, नए दोस्त बनाए, खेले-कूदें और बड़े सपने देखे। अदालत ने उसे पूरा भरोसा दिलाया कि दोषी व्यक्ति अब कभी बाहर नहीं आएगा। इस तरह के मानवीय प्रयासों से पीड़ित बच्चों को मानसिक आघात से उबरने और समाज में सम्मानजनक तरीके से जीने की नई ऊर्जा मिलती है, जो न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाता है।
दोषी पक्ष ने साकेत कोर्ट के इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने निचली अदालत की इस अनोखी और संवेदनशील पहल की भूरी-भूरी प्रशंसा की। अदालत का मानना है कि सामान्यतया न्यायिक फैसले केवल कानूनी धाराओं तक सीमित रहते हैं, लेकिन इस तरह के भावुक और आश्वस्त करने वाले संदेश पीड़ितों के भीतर एक नया विश्वास जगाते हैं। यह पूरी घटना न केवल कानूनी सख्ती का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि न्यायपालिका पीड़ितों के दर्द के प्रति कितनी संवेदनशील हो सकती है।
