लखनऊ PGI में 11 साल बाद मरीज के सीने से निकला ड्रिल बिट, up news में चर्चा
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) के डॉक्टरों ने चिकित्सा जगत में एक अनूठा कारनामा कर दिखाया है। यहां के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में डॉक्टरों ने एक मरीज के सीने में पिछले 11 वर्षों से फंसे एक धातु के ड्रिल बिट को बेहद जटिल सर्जरी के बाद सफलतापूर्वक बाहर निकाला है। इस बड़ी चिकित्सा सफलता से कुशीनगर के रहने والے 53 वर्षीय मरीज को आखिरकार उस दर्द से मुक्ति मिल गई है जो उसे पिछले एक दशक से अधिक समय से परेशान कर रहा था। इस तरह की मेडिकल लापरवाही और लंबे समय तक शरीर में विदेशी वस्तु का फंसे रहना आम जनता के स्वास्थ्य के प्रति बड़ी चिंता का विषय बनता है।
मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो यह घटना साल 2014 की है, जब पीड़ित एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया था। इस हादसे में उसकी दाहिनी बांह की हड्डी (ह्यूमरस) टूट गई थी। इसके इलाज के सिलसिले में वर्ष 2015 और उसके बाद लखनऊ के ही एक अन्य संस्थान में मरीज की बांह के चार बार ऑपरेशन किए गए, लेकिन हड्डी फिर भी नहीं जुड़ी। आशंका है कि इन्हीं उपचार प्रक्रियाओं के दौरान डॉक्टर की लापरवाही से ड्रिल बिट का हिस्सा उसके सीने में चला गया, जो अंदर ही फंसा रहा। मरीज सामान्य जीवन जीने की कोशिश तो करता रहा, लेकिन सीने में उठने वाले लगातार दर्द ने उसका जीना मुहाल कर दिया था। आखिरकार, जब दर्द असहनीय हो गया तो वह पीजीआई पहुंचा।
जब मरीज पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर पहुंचा, तो डॉक्टरों ने उसकी स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए सीने का एक्स-रे और सीटी स्कैन कराया। जांच में सीने के भीतर एक लोहे की वस्तु साफ नजर आई। ट्रॉमा सर्जन डॉ. अमित कुमार सिंह के नेतृत्व में आर्थोपेडिक और अन्य विभागों के विशेषज्ञों की एक विशेष टीम गठित की गई। विभिन्न विभागों के समन्वय से बनी इस टीम ने जोखिम भरे इस ऑपरेशन की रूपरेखा तैयार की और बेहद सावधानी बरतते हुए सीने को चीरकर ड्रिल बिट को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। इसके साथ ही डॉक्टरों ने मरीज की बांह की टूटी हुई हड्डी को भी सही स्थिति में फिक्स कर दिया है, जिससे भविष्य में उसके पूरी तरह से स्वस्थ होने की उम्मीद बंध गई है।
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि मानव शरीर के भीतर किसी विदेशी धातु का इतने लंबे समय तक रहना कई गंभीर संक्रमण या अंगों को नुकसान पहुंचा सकता था। समय रहते सही निदान और उच्चस्तरीय चिकित्सा मिलने से मरीज की जान बचाई जा सकी। इस घटना ने एक बार फिर चिकित्सा क्षेत्र में ऑपरेशन के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों और मरीजों की सुरक्षा के मानकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। फिलहाल, मरीज की हालत स्थिर है और वह डॉक्टरों की निगरानी में तेजी से रिकवर कर रहा है।
