नीलकंठ वर्णी: 11 साल की उम्र में 12000KM पैदल, आगे चलकर बने स्वामीनारायण
दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर परिसर में भगवान स्वामीनारायण के किशोरावस्था स्वरूप ‘नीलकंठ वर्णी’ की 108 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है। यह प्रतिमा एक पैर पर खड़ी विश्व की सबसे ऊंची मूर्तियों में से एक है। 26 मार्च को इसकी प्राण प्रतिष्ठा की गई।
भगवान स्वामीनारायण का जन्म 3 अप्रैल 1781 को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के छपिया गांव में घनश्याम पांडे के रूप में हुआ था। कहा जाता है कि मात्र 3 वर्ष की आयु में ही एक मुनि ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक एक महान धर्म की स्थापना करेगा।
माता-पिता के निधन के बाद, 11 साल की उम्र में घनश्याम ने घर छोड़ दिया और आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़े। अगले 7 वर्षों तक, उन्होंने पैदल ही 12000 किलोमीटर की यात्रा तय की, जिसका उद्देश्य हिंदू सनातन धर्म के आदर्शों को पुनर्स्थापित करना था। इस दौरान वे ‘नीलकंठ वर्णी’ के नाम से जाने गए।
नीलकंठ वर्णी ने हिमालय की चोटियों से लेकर दक्षिण के समुद्री तटों तक की यात्रा की। उन्होंने हिमालय पर महीनों तक तपस्या की। घर से केवल एक धोती, धर्मग्रंथ, मूर्ति और भिक्षापात्र लेकर निकले नीलकंठ ने लोगों को ईश्वर से जोड़ने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनकी तपस्या और साहस ने अनगिनत लोगों को प्रेरित किया।
समाज में अंधविश्वास के बढ़ते प्रभाव के दौर में, नीलकंठ वर्णी ने अपनी यात्राओं से हिंदू धर्म की आस्था, भक्ति और नियमों की अवधारणाओं को पुनर्जीवित किया। बाद में गुजरात में गुरु रामानंद स्वामी से मिलने के बाद, उन्हें मनुष्य के शरीर में भगवान बताया गया और नारायण मुनि व सहजनंद स्वामी जैसे नाम दिए गए।
1802 में रामानंद स्वामी ने उन्हें उद्धव संप्रदाय का नेतृत्व सौंपा। गुरु के निधन के बाद, सहजनंद स्वामी ने अनुयायियों को ‘स्वामीनारायण’ मंत्र सिखाया और वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। आज स्वामीनारायण संप्रदाय के लाखों अनुयायी दुनिया भर में फैले हुए हैं। इस प्रतिमा की स्थापना से भक्तों को प्रेरणा मिलेगी और यह स्थल और अधिक आकर्षक हो गया है।
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