इजरायल में राष्ट्रीय चुनाव की शुरुआत, भारत से कितनी अलग है वहां की मतदान प्रक्रिया | israel election system
इजरायल में सुरक्षा संकट और हालिया संघर्षों के बीच अहम राष्ट्रीय चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के साथ-साथ देश की आगामी रणनीतिक दिशा तय करने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चुनाव परिणामों का असर केवल क्षेत्रीय राजनीति पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।
भारत और इजरायल की लोकतांत्रिक प्रणालियों में जमीन-आसमान का फर्क है। भारत की तरह इजरायल में अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम का इस्तेमाल नहीं होता है। इजरायल का पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है, जहां मतदाता किसी व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि पार्टी के पक्ष में मतदान करते हैं। मतदाता कार्डबोर्ड स्क्रीन के पीछे पार्टी के हिब्रू अक्षरों वाली पर्ची चुनकर बैलट बॉक्स में डालते हैं।
इजरायल की संसद, जिसे ‘नेसेट’ कहा जाता है, उसमें कुल 120 सीटें हैं। चुनाव नियमों के अनुसार किसी भी पार्टी को संसद में प्रवेश के लिए न्यूनतम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करना अनिवार्य है। सरकार गठन के लिए 61 सीटों के जादुई आंकड़े की जरूरत होती है। इतिहास गवाह है कि इजरायल में कभी भी किसी अकेली पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, जिस वजह से हमेशा गठबंधन सरकारों का ही बोलबाला रहता है।
इस बार के चुनावी सर्वेक्षणों के अनुसार अर्थव्यवस्था और सुरक्षा जनता के सबसे बड़े मुद्दे बने हुए हैं। मतदान समाप्त होते ही वोटों की गिनती शुरू हो जाती है और शुरुआती रुझान सामने आने लगते हैं। चुनाव के बाद राष्ट्रपति बहुमत या समर्थन जुटाने वाले दल के नेता को सरकार बनाने का न्योता देते हैं, जिन्हें तय समय सीमा के भीतर बहुमत साबित करना होता है।
