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निठारी कांड: सबूतों की टूटी चेन, फोरेंसिक विफलता ने कटघरे में जांच एजेंसियों को खड़ा किया

By Nov 18, 2025

नोएडा के निठारी गांव से जुड़ा वह भयावह हत्याकांड, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था, अब एक नए मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। बहुचर्चित निठारी कांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है। कोर्ट ने इस मामले में सबूतों की श्रृंखला में गंभीर खामियों, चेन ऑफ कस्टडी के उल्लंघन और फोरेंसिक जांच की विफलता पर कड़ी आपत्ति जताई है।

यह मामला 2006-07 में तब सामने आया था जब मोहिंदर पंढेर की कोठी के पीछे नाले से आठ बच्चों के कंकाल मिले थे। उस समय दिल्ली से लेकर देश के अन्य हिस्सों तक लोगों में भारी आक्रोश था। पुलिस जांच तेज हुई, पंढेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया गया। दोनों को निचली अदालतों ने दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन न्याय की प्रक्रिया में यह मामला लंबा खिंचता रहा। पहले मोहिंदर पंढेर और अब सुरेंद्र कोली का बरी होना, कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ शामिल थे, ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सबूतों को जिस तरह से पेश किया गया, उसमें भारी कमियां थीं, जिससे अभियुक्तों के खिलाफ मजबूत मामला नहीं बन सका। इस फैसले के बाद, निठारी गांव में और नोएडा के आसपास के इलाकों में यह चर्चा आम है कि जब पंढेर और कोली दोनों अब बाहर हैं, तो फिर उन मासूम बच्चों का असली कातिल कौन है?

यह घटना उस समय की जांच की सीमाओं को भी उजागर करती है। 2006-07 में फोरेंसिक विज्ञान और अपराध स्थल प्रबंधन की प्रक्रियाएं आज के मुकाबले काफी भिन्न थीं। उस दौर में DNA विश्लेषण, ऑटोप्सी रिपोर्ट की सटीकता और क्राइम सीन के संरक्षण में जो खामियां रह गईं, वे इस मामले में सबूतों की श्रृंखला को कमजोर करने का कारण बनीं। आज, जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और उन्नत फोरेंसिक तकनीकें उपलब्ध हैं, तब यह सोचना स्वाभाविक है कि क्या उस समय की जांच को और बेहतर तरीके से किया जा सकता था।

बच्चों के माता-पिता के लिए यह न्याय की एक लंबी और दर्दनाक यात्रा रही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भले ही कानूनी तौर पर कोली को बरी कर दिया हो, लेकिन उन परिवारों के लिए न्याय की तलाश अभी बाकी है। यह मामला एक बार फिर भारत में न्याय प्रणाली की जटिलताओं और साक्ष्यों के संग्रह व प्रस्तुति में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है। क्या कभी इस मामले में असली अपराधी पकड़ा जाएगा या निठारी कांड भी एक अनसुलझी पहेली बनकर रह जाएगा, यह देखना बाकी है।

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