MSME पर नियमों का पहाड़: साल भर में 1,456 अनुपालन का बोझ, RBI ने उठाया बड़ा कदम
भारत लंबे समय से विश्व की सबसे तेज गति से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है। इतनी तेज वृद्धि के बावजूद तमाम जानकार यह मानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी अपनी क्षमताओं से कम प्रदर्शन कर रही है। यानी भारतीय आर्थिकी और तेज गति से दौड़ने में सक्षम है, लेकिन इस राह में कुछ बाधाएं भी हैं। ऐसी ही एक बाधा नियमन एवं अनुपालन के बोझ से जुड़ी हुई है।
‘भारत में एमएसएमई विनिर्माण के लिए अनुपालनों की पड़ताल’ शीर्षक से प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट इसे रेखांकित भी करती है। इसके अनुसार किसी राज्य में सक्रिय एमएसएमई को साल भर में अनुपालन की करीब 1,456 कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता है। इनमें से 998 कसौटियां तो काफी कड़ी होती हैं। साल भर के दौरान उन्हें 70 से अधिक अनुमतियां प्राप्त करनी होती हैं। करीब 48 वैधानिक रजिस्टर बनाने पड़ते हैं और करीब 59 प्रकार के विभिन्न निरीक्षणों की तैयारी करनी पड़ती है।
वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान 9,321 नियामकीय संशोधन हुए। देश में सक्रिय करीब साढ़े छह करोड़ एमएसएमई को इन बदलावों का सामना करना पड़ता है। इससे उनकी अनुपालन लागत बढ़ी होगी। एक इकाई पर साल भर में 13 से 17 लाख रुपये का बोझ बढ़ता है। पहले से ही सीमित संसाधनों वाले छोटे उद्यमों पर यह एक बड़ी आपदा जैसा है। याद रहे कि जीडीपी में 30 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले ये उद्यम रोजगार सृजन के बड़े माध्यम भी हैं।
नियमन के मोर्चे पर इन प्रतिकूलताओं को दूर करने की दिशा में भारतीय रिजर्व बैंक ने 28 नवंबर को एक असाधारण पहल की है। उसने स्वेच्छा से अपने नियामकीय दायरे को 97 प्रतिशत तक घटा दिया है। यह गहरे नीतिगत बदलाव का संकेत है। यह कहना गलत होगा कि इस परिवर्तन में नीति आयोग की किसी उच्चस्तरीय समिति की भूमिका रही है। रिजर्व बैंक का यह कदम उसकी स्वयं की आंतरिक समीक्षा और नियामकीय सुव्यवस्था के प्रयासों का परिणाम है।
जहां तक नीति आयोग में पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा की अध्यक्षता वाली समिति का प्रश्न है तो यह समिति लाइसेंस, परमिट, निरीक्षण प्रणालियों और अनुपालन बोझ जैसे गैर-वित्तीय नियमनों संबंधी सुधारों पर केंद्रित है। गौबा के नेतृत्व वाली समिति ने विश्वास आधारित एवं पारदर्शिता को प्रोत्साहन देने वाली नियामकीय प्रणाली का विचार प्रणाली का सुझाव दिया है।
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