मध्य प्रदेश में बाल विवाह की रोकथाम विफल, मामले लगातार बढ़ रहे हैं
मध्य प्रदेश में बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति को खत्म करने के सरकारी दावे खोखले साबित हो रहे हैं। हकीकत यह है कि बाल विवाह के मामले घटने के बजाय हर साल लगातार बढ़ते जा रहे हैं। पिछले छह वर्षों में प्रदेश में बाल विवाह के कुल 2,909 मामले दर्ज किए गए हैं, जो चिंता का एक गंभीर विषय है। सबसे अधिक मामले दमोह और सागर जिलों से सामने आए हैं, जहां क्रमशः 293 और 202 बाल विवाह हुए।
यह चौंकाने वाली जानकारी गुना के राघौगढ़ से कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह द्वारा विधानसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने दी। विधायक जयवर्धन सिंह ने 2020 से 2025 तक की अवधि में बाल विवाह के मामलों में हुई वृद्धि पर सवाल उठाया था। उन्होंने कहा कि प्रदेश में बाल विवाह पूरी तरह प्रतिबंधित होने के बावजूद इतने बड़े पैमाने पर ऐसे आयोजन होना, करोड़ों रुपये खर्च करने, विभिन्न योजनाएं चलाने और अभियानों के दावों की पोल खोलता है।
प्रदेशभर में बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी नियुक्त होने और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाओं के तहत माहवार गतिविधियां आयोजित होने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं दिख रहा है। अक्षय तृतीया और देव उठनी एकादशी जैसे शुभ अवसरों पर विशेष जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। नुक्कड़ नाटक, बाल चौपाल, कार्यशालाएं और रैलियां भी आयोजित की जाती हैं। जिला और ब्लॉक स्तर पर विशेष टीमें, सूचना दल, उड़न दस्ते, कंट्रोल रूम और नियंत्रण कक्ष भी गठित किए गए हैं। इसके बावजूद, जमीनी हकीकत बेहद निराशाजनक है।
आंकड़ों के अनुसार, दमोह के बाद सागर में 202, गुना में 146, देवास में 121, डिंडौरी में 86, रतलाम में 78, धार में 72, मंदसौर में 69, झाबुआ में 68 और विदिशा व उज्जैन में 60-60 बाल विवाह के मामले सामने आए हैं। यदि वार्षिक आंकड़ों को देखें तो 2020 में 366, 2021 में 236, 2022 में 519, 2023 में 528, 2024 में 529 और 2025 में 538 बाल विवाह के मामले दर्ज हुए हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि मामलों में कमी के बजाय वृद्धि ही देखी जा रही है। यह स्थिति बालिकाओं के भविष्य और उनके अधिकारों के हनन की ओर इशारा करती है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
