माया को जीतने के लिए आत्मा को पहचानें, मिलेगी सफलता
शुभ कर्मों से सुख और अशुभ कर्मों से दुख प्राप्त कर मनुष्य इस संसार-सागर में डूबता-उतराता रहता है। यतिवर अंतरिक्ष जी के उपदेशानुसार, जो मनुष्य इस दुखमय संसार से मुक्ति चाहता है, उसे माया के रहस्य को समझना होगा। इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि हम यह शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध, शाश्वत, चैतन्यमय आत्मा हैं। शरीर, मन और इंद्रियां केवल उपकरण हैं, जिनके माध्यम से आत्मा कर्म का अनुभव करती है।
आचार्य नारायण दास, जो भागवतमर्मज्ञ आध्यात्मिक गुरु हैं, के अनुसार निष्काम कर्मयोग माया को पराजित करने का सर्वोत्तम उपाय है। पिछले प्रसंगों में राजा निमि की जिज्ञासाओं का समाधान होने के पश्चात, उन्होंने अपनी तीसरी जिज्ञासा प्रस्तुत करते हुए योगेश्वरों से पूछा कि वे परमेश्वर श्रीहरि की माया के विषय में जानें, जो स्वयं मायावी जनों को भी मोहित कर देती है।
तीसरे योगेश्वर अंतरिक्ष जी ने राजा की इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए बताया कि भगवान की माया उनकी दैवी शक्ति है, जो असीम, अवर्णनीय और अनंत है। संपूर्ण सृष्टि उसी माया का चमत्कार है। भगवान स्वयं कारण बनकर पांच महाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के माध्यम से असंख्य शरीरों की रचना करते हैं और उनमें अंतर्यामी रूप से स्थित होकर मन, बुद्धि और इंद्रियों का संचालन करते हैं।
हालांकि, जब जीव अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूलकर देहाभिमान में डूब जाता है, तब वह माया के जाल में फंस जाता है। यह अज्ञान ही उसका सबसे बड़ा बंधन बन जाता है। वह शरीर और इंद्रियों को ही सत्य मानकर विषयभोग में लिप्त हो जाता है। आसक्ति की यह गांठ उसे कर्मों की जंजीरों में जकड़ देती है, जहां फलेच्छा से किए गए कर्म उसे जन्म-मृत्यु के अनंत चक्र में घुमाते रहते हैं।
माया से मुक्ति का एकमात्र उपाय है, शाश्वत ज्ञान और नश्वर पदार्थ से सहज अनासक्ति। श्रीगुरु गोविंद की कृपा और सत्संगादि के अमोघ प्रभाव से जब मनुष्य को आत्मज्ञान हो जाता है, तब वह सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान, ईर्ष्या-मात्सर्य और राग-द्वेषादि से विमुक्त हो जाता है। विवेक-विचार के द्वारा उसे यह बोध हो जाता है कि संसार का वैभव क्षणिक है, तब उसका मन स्थिर हो जाता है।
इस स्थिति में मनुष्य बाह्य परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना फलासक्ति से रहित कर्तव्यबोधपूर्वक सहज कर्म करता है। यही निष्काम कर्मयोग है, जो माया को पराजित करने का सर्वोत्तम उपाय है। जीवन-प्रबंधन की दृष्टि से भी यह शिक्षा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आज का मनुष्य भौतिक उपलब्धियों के मोह में उलझा हुआ है, जिससे तनाव, असंतोष और भय उसके साथी बन गए हैं। श्रीमद्भागवत हमें शिक्षा देती है कि यथार्थ जीवन-प्रबंधन बाहरी व्यवस्था से नहीं, अपितु अभ्यांतरिक शुचिता और समता में है। आत्मबोध को प्राप्त व्यक्ति के मायाबंधन स्वतः ही कट जाते हैं, जिससे उसके जीवन में स्थायित्व, व्यवहार में पारदर्शिता और मन में अविचल शांति प्रतिष्ठित हो जाती है।
