मां बनने पर सजा क्यों? पटना हाई कोर्ट ने प्राध्यापिका को दिया इंसाफ
पटना हाई कोर्ट ने मातृत्व लाभ से जुड़े एक ऐतिहासिक फैसले में तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय की उस कार्रवाई को असंवैधानिक ठहराया है, जिसके तहत एक सहायक प्राध्यापिका को मातृत्व अवकाश के दौरान वेतन, सेवा अनुभव और वेतनवृद्धि से वंचित कर दिया गया था। न्यायाधीश हरीश कुमार की एकलपीठ ने सहायक प्राध्यापिका मुबीना ओ. के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें न केवल अवकाश अवधि का पूरा वेतन देने, बल्कि सेवा अनुभव में उसे शामिल करने और रोकी गई वार्षिक वेतनवृद्धि को भी बहाल करने का आदेश दिया है।
अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश महिला कर्मचारी का एक वैधानिक और संरक्षित अधिकार है, जिसे किसी भी विश्वविद्यालय की उपविधि, शर्त या प्रशासनिक निर्णय के माध्यम से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। यह अधिकार मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत सभी महिला कर्मचारियों, चाहे वे नियमित हों, संविदा पर हों या दैनिक वेतनभोगी, पर समान रूप से लागू होता है।
मामले की सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से वरीय अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि मुबीना ओ. वर्ष 2019 में समाजशास्त्र विभाग में नियुक्त हुई थीं और 10 मई 2020 से 11 नवंबर 2020 तक स्वीकृत मातृत्व अवकाश पर थीं। इसके बावजूद, विश्वविद्यालय ने उन्हें न तो उक्त अवधि का वेतन दिया, न ही उनके सेवा अनुभव में इसे गिना और न ही जुलाई 2020 से देय वार्षिक वेतनवृद्धि प्रदान की।
विश्वविद्यालय की ओर से यह तर्क दिया गया था कि बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 की सेवा उपविधि (रूल 28) के अनुसार, किसी महिला कर्मचारी को दो वर्ष की निरंतर सेवा पूर्ण किए बिना मातृत्व अवकाश का लाभ नहीं दिया जा सकता। अदालत ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने जोर देकर कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 27 किसी भी विरोधी सेवा नियम को अप्रभावी बना देती है।
उच्चतम न्यायालय के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए, अदालत ने कहा कि मातृत्व अधिकारों पर किसी भी प्रकार की रोक लगाना ‘लोक नीति के विरुद्ध’ और ‘सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल’ है। यह निर्णय न केवल याचिकाकर्ता के लिए न्याय सुनिश्चित करता है, बल्कि पूरे देश में महिला कर्मचारियों के मातृत्व अधिकारों को मजबूत करता है।
अदालत ने विश्वविद्यालय और राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता को 10 मई 2020 से 11 नवंबर 2020 तक की अवधि का पूरा वेतन, सेवा गणना और रोकी गई वेतनवृद्धि सहित सभी लाभों को आठ सप्ताह के भीतर बहाल करें। यह फैसला कार्यस्थल पर लैंगिक समानता और महिला कर्मचारियों के अधिकारों के प्रति एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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