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मालदा: हरिश्चंद्रपुर में लोमड़ी के आतंक से कांप रहे ग्रामीण, बच्चों पर हमले

By Nov 3, 2025

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का हरिश्चंद्रपुर क्षेत्र इन दिनों लोमड़ी के आतंक से थर्रा रहा है। यहां के सुदूर ग्रामीण इलाकों में शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है। लोमड़ियों की हुंकार सुनकर ग्रामीण घरों में दुबक जाते हैं और सड़कें सुनसान हो जाती हैं। यह स्थिति हर रात की है, जिसने ग्रामीणों की नींद हराम कर दी है।

यह कोई नई बात नहीं है। करीब तीन साल पहले हरदमनगर गांव में एक रात सुनहरी लोमड़ी के हमले में लगभग 40 ग्रामीण घायल हो गए थे। तब से हर सर्दी का मौसम आते ही यहां के लोगों में लोमड़ी का डर फिर से लौट आता है। पिछले महीने ही भालुका इलाके में दो बच्चों के गाल से लोमड़ी ने मांस नोच लिया था, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। ऐसी ही दहशत अब मानिकचक और वैष्णवनगर इलाकों में भी फैल रही है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, हरिश्चंद्रपुर के दोनों ब्लॉकों के विस्तृत ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से वन क्षेत्र कम हो रहा है। वनों के विनाश के कारण भोजन और आवास के संकट से जूझ रही सुनहरी लोमड़ियों का झुंड अब आबादी वाले इलाकों में घुस रहा है। चिंताजनक बात यह है कि करियाली और चांचल वन रेंज में पर्याप्त कर्मचारियों की कमी के कारण वन विभाग की गश्त लगभग न के बराबर है।

करियाली वन रेंज के अधिकारी दिलीप दास ने मीडिया को बताया कि हरिश्चंद्रपुर-2 ब्लॉक के कई गांवों में झाड़ियों, बांस के झुरमुटों और यहां तक कि लोगों के घरों में धान के कोठरों के नीचे भी लोमड़ियों के बिल देखे जा रहे हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि वनों के कम होने के कारण लोमड़ियां रिहायशी इलाकों में आ रही हैं। इसके अलावा, हाट-बाजारों या त्योहारों के बाद फेंके गए जूठे भोजन की गंध से भी अधिक लोमड़ियां गांवों की ओर आकर्षित हो रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ग्राम पंचायत के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

ग्रामीणों का दावा है कि लोमड़ी, सांप और अन्य जंगली जानवरों के हमले अब रोजमर्रा की घटना बन गए हैं। इसके बावजूद, उन्हें एंटी-रेबीज या एंटी-वेनम इंजेक्शन के लिए ग्रामीण अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है, जहां कई बार इम्यूनोग्लोबुलिन इंजेक्शन उपलब्ध नहीं होते। हालांकि, इस संबंध में हरिश्चंद्रपुर-2 ब्लॉक के मेडिकल ऑफिसर डॉ. तापस मुखर्जी ने मीडिया को बताया कि अस्पताल में पर्याप्त टीके मौजूद हैं।

सर्दी के आगमन के साथ ही हरिश्चंद्रपुर में एक बार फिर पुराने आतंक की वापसी हुई है। एक ओर वनों का अंधाधुंध कटान और दूसरी ओर प्रशासनिक लापरवाही, इन्हीं का फायदा सुनहरी लोमड़ियों का झुंड उठा रहा है। इसका खामियाजा निर्दोष ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है, जो हर शाम लोमड़ी के डर से अपने घरों में कैद होने को मजबूर हैं।

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