लिव-इन पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: क्या आधुनिकता भारतीय मूल्यों से टकरा रही है?
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण और तल्ख टिप्पणी की है, जिसने भारतीय समाज में इस रिश्ते की स्वीकार्यता और इसके कानूनी पहलुओं पर नई बहस छेड़ दी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किसी भी संबंध के समाप्त हो जाने या अप्रिय हो जाने मात्र से उसे बाद में दुष्कर्म के रूप में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। विवाह के झूठे वादे पर लगाए गए दुष्कर्म के आरोप तभी स्वीकार्य होंगे, जब वे स्पष्ट और ठोस साक्ष्य से समर्थित हों। वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध का टूट जाना पुरुष के खिलाफ दुष्कर्म के आपराधिक मामले की आधारशिला नहीं बन सकता।
औरंगाबाद के एक वकील पर दुष्कर्म के मामले को निरस्त करते हुए, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि हर बिगड़े हुए संबंध को दुष्कर्म के अपराध में परिवर्तित करना न केवल अपराध की गंभीरता को कम करता है, बल्कि आरोपित पर अमिट कलंक और गंभीर अन्याय भी थोपता है। आपराधिक न्याय प्रणाली के ऐसे दुरुपयोग को न्यायालय ने अत्यंत गंभीर चिंता का विषय बताया है।
यह पहली बार नहीं है जब न्यायालय ने लिव-इन में रह रहे जोड़ों पर ऐसी तीखी टिप्पणी की हो। जून 2025 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में कहा था कि लिव-इन संबंध भारतीय मध्यमवर्गीय समाज के मूल्यों के विपरीत हैं और अक्सर कानूनी विवादों का कारण बनते हैं, जिसका महिलाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
वर्तमान में भारतीय समाज एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रहा है, जहाँ कथित नारीवादी समूह स्त्री की स्वतंत्रता को विवाह से मुक्ति में देख रहे हैं। इसी के चलते, विवाह को एक बंधन मानने वाली और उसे नकारने वाली युवतियों की संख्या बढ़ रही है, जो लिव-इन रिलेशनशिप को एक विकल्प के रूप में अपना रही हैं।
आज की युवा पीढ़ी, स्वयं को आधुनिक मानते हुए, परंपरागत नियमों की अनदेखी कर लिव-इन रिलेशनशिप को स्वतंत्र सोच का प्रतीक मानती है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार, कई बार वे स्वयं को एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा पाती हैं जिससे बाहर निकलना आसान नहीं होता। अदनान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2023) मामले में न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि पहली नजर में लिव-इन रिश्ता आकर्षक लग सकता है, पर समय बीतने के साथ जोड़ों को यह अहसास होने लगता है कि उनके रिश्ते को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है और वह जीवन भर नहीं चल सकता।
