किसानों ने आजमाई नई तरकीब, एक साथ तीन फसलें उगाकर ‘अमीर’ बनने का रास्ता खोजा
भारत-नेपाल की सीमा पर बसे पूर्वी चंपारण जिले के आदापुर प्रखंड के किसानों ने आय दोगुनी करने की दिशा में एक अभिनव प्रयोग किया है। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो न केवल इनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि यह क्षेत्र और जलवायु के अन्य किसानों के लिए भी समृद्धि के नए द्वार खोल सकता है। यहां के किसानों ने एक ही खेत में एक साथ तीन फसलें उगाने की व्यावहारिक विधि विकसित की है।
आदापुर प्रखंड के चिकनी गांव के किसानों की सब्जी की खेती की यह अनूठी पद्धति अब क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है। ये किसान एक साथ तीन फसलों से अधिकतम उत्पादन का लक्ष्य रखते हैं। इनकी रणनीति के अनुसार, पहले खेत में आलू की बुवाई की जाती है। आलू की फसल के कटाई के उपरांत उसी खेत में मौसमी सब्जियों जैसे करेला, बोड़ी, टमाटर, खीरा, लौकी और मिर्च की खेती की जाती है। आलू की फसल के बाद खेत को मक्का की खेती के लिए तैयार किया जाता है। इस प्रकार, एक ही भूमि से साल भर में तीन बार फसल प्राप्त की जाती है।
किसानों का कहना है कि भले ही उन्हें खेती के लिए कोई विशेष प्रशिक्षण न मिला हो, लेकिन सब्जी की खेती में उनकी मेहनत और जुझारूपन ने उन्हें यह सफलता दिलाई है। छठ महापर्व से पहले करीब बीस बीघा जमीन में आलू की बुवाई की गई थी। हालांकि, अप्रत्याशित बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी थी, लेकिन वे हतोत्साहित नहीं हुए और अपनी मेहनत जारी रखी। अब खेतों में लहलहाती आलू की फसल देखकर उनकी मेहनत का फल मिलने की उम्मीद जगी है।
किसानों के अनुसार, एक कट्टा खेत में आलू की रोपाई और खेत तैयार करने में लगभग आठ हजार रुपये की लागत आती है, जिससे प्रति कट्टा करीब छह क्विंटल उपज प्राप्त होती है। यह उपज लागत निकालने के लिए पर्याप्त है। इसके बाद, सब्जी की फसलों से अतिरिक्त लाभ कमाया जाता है। किसानों ने बताया कि आलू की खेती से उनकी लागत तो निकल जाती है, लेकिन सब्जी की फसलों से उन्हें वास्तविक मुनाफा होता है, जो उन्हें खेती जारी रखने के लिए प्रेरित करता है।
किसानों ने यह भी बताया कि उन्हें खेती के लिए सरकारी स्तर पर कोई विशेष सहयोग प्राप्त नहीं होता है। बीते माह हुई बारिश से आलू की फसल को नुकसान की आशंका ने उन्हें चिंतित कर दिया था, लेकिन मौसम के साथ मिलते ही उन्हें राहत मिली है। किसानों का कहना है कि यदि उन्हें समय-समय पर उर्वरक और बीज जैसी आवश्यक सामग्री उपलब्ध होती रहे, तो उनकी खेती और बेहतर हो सकती है। इसके अतिरिक्त, प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान की स्थिति में यदि सरकार से सहायता मिले, तो यह किसानों के हित में एक बड़ा कदम होगा।
