कासगंज में गन्ने की मिठास फीकी, भुगतान में देरी से किसान परेशान
कासगंज जनपद में किसानों का रुझान गन्ने की खेती से लगातार कम होता जा रहा है। कभी जनपद की प्रमुख फसलों में शुमार गन्ने का रकबा आठ हजार हेक्टेयर से घटकर अब मात्र छह हजार 300 हेक्टेयर रह गया है। इसके पीछे मुख्य वजह चीनी मिलों द्वारा भुगतान में की जा रही देरी और बाजार में उचित मूल्य न मिलना बताया जा रहा है। किसान अब गन्ने की जगह आलू, गेहूं और सरसों जैसी फसलों को अधिक मुनाफा देने वाली और नकदी वाली फसल मान रहे हैं।
गंगा किनारे कटरी क्षेत्र में सोरों से लेकर फर्रूखाबाद बॉर्डर तक 74 किलोमीटर के लंबे क्षेत्र में गन्ने की खेती किसानों की प्राथमिकता हुआ करती थी। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अन्य फसलों की तुलना में गन्ने को अधिक महत्व देते थे। किसानों का कहना है कि चीनी मिलों द्वारा समय पर भुगतान न होने के कारण वे इस खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। जब किसान अपनी गन्ने की फसल को बाजार में बेचने जाते हैं, तो उन्हें प्रति क्विंटल करीब 250 रुपये का ही भाव मिल पाता है, जो लागत निकालने के बाद भी घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
इस कारण किसान अब गन्ने को छोड़कर गेहूं, आलू, लहसुन, बाजरा आदि फसलों की ओर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इन फसलों से उन्हें न केवल अधिक मुनाफा मिल रहा है, बल्कि ये नकदी फसलें भी साबित हो रही हैं। किसानों के अनुसार, पहले जब अन्य जनपदों से भी गन्ना पिराई के लिए मिलों में आता था, तब भुगतान समय पर हो जाता था। लेकिन अब भुगतान में हो रही देरी के चलते किसान इस खेती से कतरा रहे हैं। गन्ने की फसल में लागत भी बढ़ गई है और रोग लगने से उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। वहीं, आलू और गेहूं जैसी फसलों को किसान अपनी सुविधानुसार बाजार में बेचकर तुरंत भुगतान प्राप्त कर सकते हैं।
सोरों के गांव बघेला के किसान ब्रजपाल सिंह बताते हैं कि पहले उनके गांव में लगभग हर घर में गन्ने की खेती होती थी। लोग जमीन पट्टे पर लेकर भी गन्ना उगाते थे। किसान नवंबर से जनवरी तक मिलों को गन्ना देते हैं, लेकिन भुगतान के लिए उन्हें एक वर्ष बाद तक भी मिल अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कटरी क्षेत्र के कई गांवों के किसान अब गन्ना की खेती छोड़ चुके हैं, जिसका मुख्य कारण भुगतान में देरी और फसल का उचित मूल्य न मिलना है।
किसानों का कहना है कि गन्ने का भुगतान समय पर न मिलने से उन्हें काफी आर्थिक दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं, जबकि आलू और गेहूं जैसी फसलें तुरंत बिक जाती हैं और भुगतान भी तत्काल मिल जाता है। गन्ना की फसल में लागत का बढ़ना, रोगों का प्रकोप और बाजार में उचित मूल्य का अभाव किसानों को इस ओर से विमुख कर रहा है। यदि चीनी मिलों से गन्ना का भुगतान समय पर होने लगे, तो निश्चित रूप से गन्ने का रकबा बढ़ सकता है, खासकर जब सरकार ने गन्ने का मूल्य भी बढ़ाया है। फिलहाल किसान आर्थिक सुरक्षा के लिए वैकल्पिक फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
