कांग्रेस वामपंथी सोच के जाल में फंसी, जनता से कटने का खामियाजा भुगत रही
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जो कभी स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआ पार्टी रही, आज अपनी वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में सही मुद्दों और लोकमर्म को छूने वाले विचारों से दूर होती जा रही है। इसका सीधा असर पार्टी के चुनावी प्रदर्शन पर दिख रहा है, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में, जहाँ कांग्रेस छोटी पार्टियों की सहायक बनकर रह गई है।
सूत्रों के अनुसार, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की नीतियों और रणनीतियों पर सवाल उठ रहे हैं, विशेष रूप से राहुल गांधी के नेतृत्व में। बिहार विधानसभा चुनावों में 243 सीटों में से 61 पर चुनाव लड़ने के बावजूद कांग्रेस केवल छह सीटें ही जीत पाई। इसके बावजूद, पार्टी में राहुल गांधी की वैचारिकी और रणनीति पर गंभीर सवाल नहीं उठाए जा रहे हैं। यह स्थिति पार्टी के भीतर चिंता का विषय बनी हुई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी की ‘आम आदमी’ बनने की कोशिशें, जैसे मखाने के खेत में उतरना या मछली पकड़ना, मतदाताओं को आकर्षित करने में विफल रही हैं। हरियाणा में धान रोपाई और ट्रैक्टर चलाने जैसी घटनाएं भी चुनावी सफलता का मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकीं। ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान भी ऐसे कई दृश्य देखे गए, लेकिन तेलंगाना को छोड़कर, इन प्रयासों का कोई खास चुनावी लाभ नहीं मिला।
पार्टी के भीतर चर्चा है कि कांग्रेस के सलाहकार, जिनका झुकाव वामपंथी दर्शन की ओर है, जमीनी हकीकत से अनभिज्ञ हैं। उनकी सोच ऊंची-नीची और जात-पांत के पारंपरिक विचारों से प्रभावित है, जो आज के विविध भारत के लिए पर्याप्त नहीं है। जातिवाद और मजहब के संदर्भ में देश को एक ही फार्मूले से समझना संभव नहीं है, लेकिन सलाहकार मंडली इसी सोच पर राहुल गांधी को आगे बढ़ने का सुझाव दे रही है।
इंदिरा गांधी का उदाहरण देते हुए, कुछ वरिष्ठ नेता पार्टी की वर्तमान दिशा पर चिंता व्यक्त करते हैं। इंदिरा गांधी की भारतीय समाज की गहरी समझ और स्थानीय परंपराओं के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता उन्हें जनता से जोड़ती थी। आज की कांग्रेस के नेता, वामपंथी सलाहकारों के प्रभाव में, शायद ऐसे जमीनी जुड़ाव को ‘दकियानूसी’ मान सकते हैं। पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेता मौजूदा हालात पर खुलकर बोलने से डर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कड़वी सच्चाई बताना उनके लिए हानिकारक हो सकता है।
पार्टी को यह समझने की आवश्यकता है कि निजीकरण के कुछ नकारात्मक पहलू हो सकते हैं, लेकिन इसने देश में चमक-दमक भी बढ़ाई है। भले ही इसका लाभ हर वर्ग तक न पहुंचा हो, लेकिन आम आदमी का सपना भी बेहतर जीवन जीने का है। वामपंथी विचारधारा इस सपने को शायद ठीक से नहीं समझ पा रही है, और कांग्रेस इसी वजह से जनता से लगातार दूर होती जा रही है।
