जलवायु परिवर्तन का दूध उत्पादन पर गहरा असर, एक दिन की गर्मी से 10 दिन का नुकसान
बढ़ती जलवायु परिवर्तन की मार अब सीधे तौर पर हमारे खान-पान पर भी पड़ने लगी है। दूध उत्पादन, जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर खतरे में है। हालिया शोधों ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं: एक दिन की भी भीषण गर्मी गायों के दूध उत्पादन को 10% तक कम कर सकती है। इसका सीधा मतलब है कि एक दिन की अत्यधिक गर्मी से होने वाला नुकसान, उत्पादन के 10 दिनों के बराबर हो सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, तापमान में वृद्धि से पशुओं के शरीर पर सीधा प्रभाव पड़ता है। गर्मी के तनाव के कारण गायें कम खाती हैं, जिससे उनके शरीर में ऊर्जा की कमी होती है और परिणामस्वरूप दूध का उत्पादन घट जाता है। यह समस्या सिर्फ दूध उत्पादन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े अन्य कारक भी प्रभावित होते हैं। पशुओं में बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे इलाज पर खर्च बढ़ता है और उत्पादन क्षमता और भी कम हो जाती है।
यह स्थिति डेयरी किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है। जो किसान अपनी आजीविका के लिए दुग्ध व्यवसाय पर निर्भर हैं, उन्हें इस बदलते मौसम का सीधा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। उत्पादन में आई यह गिरावट न केवल उनकी आय को प्रभावित करती है, बल्कि देश की दूध की आपूर्ति श्रृंखला पर भी दबाव डालती है।
चिंता की बात यह है कि यह केवल दूध उत्पादन की समस्या नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन का व्यापक प्रभाव खाद्य सुरक्षा और अन्य फसलों पर भी देखा जा रहा है। उदाहरण के लिए, धान की फसल में भी तापमान वृद्धि से बीमारियों का प्रकोप बढ़ा है, जिससे उत्पादन पर 10% तक असर पड़ सकता है। इसी तरह, प्लास्टिक कचरे से पनप रहे रोगाणु एंटीबायोटिक प्रतिरोध को बढ़ा रहे हैं, जिससे बीमारियां और गंभीर हो रही हैं। दिल्ली जैसे शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर ‘बेहद खराब’ श्रेणी में पहुंच गया है, जो दिल और दिमाग की सेहत के लिए खतरनाक है। मिट्टी की घटती उत्पादकता खाद्य संकट और कुपोषण के खतरे को बढ़ा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है। इसमें जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के वैश्विक प्रयास, पशुओं के लिए बेहतर प्रबंधन तकनीकें, और किसानों को ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए सहायता प्रदान करना शामिल है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में दूध और अन्य खाद्य पदार्थों की उपलब्धता पर गंभीर संकट आ सकता है।
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