उत्तराखंड ग्लेशियरों के लिए नाकाफी बर्फबारी, वैज्ञानिकों को चिंता – Glacier Health Concerns
उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में हुई हालिया बर्फबारी ने ग्लेशियरों पर एक पतली चादर बिछाई है, लेकिन यह उनकी सेहत के लिए पर्याप्त नहीं है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता के अनुसार, ग्लेशियरों को ‘रजाई जैसी मोटी’ बर्फ की परत की जरूरत होती है। नवंबर और दिसंबर में बर्फबारी की कमी के कारण ग्लेशियरों की मुख्य बर्फ पिघलने लगी थी।
हालांकि, जनवरी के अंत में हुई बर्फबारी ने कुछ राहत दी है, लेकिन यह अभी भी नाकाफी है। डॉ. मेहता ने समझाया कि बर्फ ग्लेशियरों की ‘खुराक’ है और जितनी अधिक बर्फ होगी, ग्लेशियर उतने ही मोटे होंगे। तापमान बढ़ने पर सबसे पहले ग्लेशियरों के स्नो कवर वाले क्षेत्र की बर्फ पिघलेगी, जिससे ग्लेशियरों की ताजा बर्फ की चादर भी प्रभावित होगी।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियरों की बर्फ की चादर को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए अभी दो से तीन और अच्छे बर्फबारी के दौर की आवश्यकता है। यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह ताजी बर्फ कुछ ही दिनों में गायब हो जाएगी और ग्लेशियरों की मुख्य बर्फ पिघलना जारी रखेगी। मंगलवार को भी उच्च क्षेत्रों में बर्फबारी की सूचना है, जिसके मजबूती से होने की उम्मीद ग्लेशियरों की वर्तमान स्थिति को तय करेगी।
