मधुमेहारी की बढ़ती मांग, आयुष विश्वविद्यालय में उत्पादन बढ़ाने की तैयारी | Ayush University
गोरखपुर के आयुष विश्वविद्यालय में निर्मित आयुर्वेदिक औषधि मधुमेहारी की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। कुलपति डा. के रामचंद्र रेड्डी के शोध पर आधारित यह औषधि, जिसमें 11 औषधीय द्रव्यों का मिश्रण है, शुगर रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है। विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों से उपचार कराने के बाद भी लाभ न मिलने वाले कई रोगी अब आयुष विश्वविद्यालय की ओपीडी में आकर मधुमेहारी का सेवन कर रहे हैं, जिससे उन्हें आराम मिल रहा है। प्रतिदिन औसतन तीन से चार सौ मरीज इस दवा का लाभ उठा रहे हैं।
मधुमेहारी के निर्माण में आम्रस्थि मज्जा, गुड़मार, जामुन की गुठली, नीम बीज, हरितकी बीज, सौंफ, हरिद्रा, आम्र गुठली, बबूल की फली, विजयसार और करेला जैसे औषधीय पौधों का प्रयोग निर्धारित अनुपात में किया जाता है। सितंबर में उत्पादन शुरू होने के बाद, पहले चरण में लगभग 60 किलोग्राम दवा तैयार की गई थी। इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने पर मांग बढ़ी और उत्पादन बढ़ाकर लगभग आठ क्विंटल कर दिया गया।
पहले यह औषधि पुड़िया के रूप में वितरित की जाती थी, लेकिन अब विश्वविद्यालय की फार्मेसी में स्वचालित मशीनों द्वारा इसकी आकर्षक पैकिंग की जा रही है। पैकेट पर निर्माण तिथि, अंतिम उपयोग तिथि और प्रयुक्त औषधीय पौधों का स्पष्ट विवरण अंकित किया जा रहा है। आयुष विश्वविद्यालय के चिकित्सक डा. रामाकांत द्विवेदी के अनुसार, यह आयुर्वेदिक औषधि रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने के साथ-साथ मधुमेह से जुड़ी जटिलताओं जैसे हृदय रोग, गुर्दा संबंधी विकार और दृष्टि समस्याओं में भी सहायक है। यह वर्तमान समय में मधुमेह से पीड़ित बड़ी आबादी के लिए एक सस्ती, सुलभ और उपयोगी विकल्प के रूप में उभरी है।
