IIT वैज्ञानिकों ने खोला सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का राज, सूखा बना मुख्य कारण
भारत की सबसे रहस्यमयी और प्राचीन सभ्यताओं में से एक, सिंधु घाटी सभ्यता, जो हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, राखीगढ़ी और लोथल जैसे शानदार शहरों के लिए जानी जाती है, आखिर क्यों विलुप्त हो गई? इस प्राचीन सभ्यता के पतन के कारणों को लेकर सदियों से शोध जारी है। अब IIT गांधीनगर के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए और व्यापक शोध में इस रहस्य से पर्दा उठा है। इस अध्ययन के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का सबसे बड़ा और मुख्य कारण लंबे समय तक चलने वाला गंभीर सूखा था।
सिंधु नदी इस सभ्यता की जीवन रेखा थी, जिस पर न केवल खेती, बल्कि व्यापार और दैनिक जीवन की अन्य सभी जरूरतें निर्भर थीं। इस नई स्टडी के लिए, वैज्ञानिकों ने पुराने जलवायु रिकॉर्ड, गुफाओं के नमूनों, झीलों की मिट्टी और उन्नत क्लाइमेट मॉडल का विश्लेषण कर हजारों सालों के मौसम का गहन अध्ययन किया।
शोध में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। वैज्ञानिकों ने पाया कि समय के साथ इस क्षेत्र में बारिश में 10 से 20 प्रतिशत तक की कमी आई, जबकि तापमान लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया। सबसे चिंताजनक बात यह थी कि लगभग 4450 से 3400 साल पहले के बीच इस क्षेत्र में चार बड़े सूखे पड़े। इनमें से एक सूखा तो 164 साल तक चला, जिसने सभ्यता के 91 प्रतिशत हिस्से को सीधे तौर पर प्रभावित किया।
शुरुआत में, सिंधु घाटी सभ्यता के लोग उन इलाकों में बसते थे जहाँ अच्छी बारिश होती थी। लेकिन जैसे-जैसे पानी की कमी बढ़ती गई, वे धीरे-धीरे सिंधु नदी के आसपास के क्षेत्रों की ओर पलायन करने लगे। हालांकि, लंबे सूखे के कारण नदी के जल प्रवाह में भी उल्लेखनीय कमी आई। पुरातात्विक साक्ष्यों और पौधों के अवशेषों से मिले सबूतों से पता चलता है कि तत्कालीन किसानों ने अपनी पारंपरिक गेहूं और जौ की फसलों को छोड़कर बाजरा जैसी सूखा-सहनशील फसलों को अपनाना शुरू कर दिया था। इसके बावजूद, लगातार पड़ते सूखे ने हालात को और भी गंभीर बना दिया।
गुफाओं और झीलों से प्राप्त जलवायु रिकॉर्ड बताते हैं कि पानी के स्रोत तेजी से घट रहे थे। अंतिम और सबसे विनाशकारी सूखा, जो लगभग 100 साल तक चला, उस दौर में बड़े शहरों को धीरे-धीरे खाली कर दिया गया और लोग छोटे-छोटे गांवों में फैल गए।
इस रिसर्च में यह भी सामने आया कि वैश्विक जलवायु पैटर्न में हो रहे बड़े बदलाव, जैसे एल-नीनो का प्रभाव और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र का ठंडा होना, भारतीय मानसून को कमजोर कर रहे थे। समुद्र के तापमान में वृद्धि के कारण जमीन और समुद्र के तापमान के बीच का अंतर कम हो गया, जिससे मानसून की बारिश लगातार घटती गई और सूखे की स्थिति और अधिक गंभीर हो गई।
सिंधु घाटी सभ्यता की यह कहानी आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि कैसे पानी की कमी किसी भी उन्नत सभ्यता को पतन की ओर धकेल सकती है। वर्तमान समय में, जब जलवायु परिवर्तन और पानी की कमी वैश्विक स्तर पर एक गंभीर खतरा बने हुए हैं, यह शोध हमें सतर्क रहने और जल संरक्षण के महत्व को समझने की प्रेरणा देता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से भारतीय मानसून में कुछ बदलाव आ सकते हैं, जो कुछ हद तक राहत दे सकते हैं, लेकिन पानी के विवेकपूर्ण उपयोग और प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
