विकसित भारत की राह में सरकारी दखल और नौकरशाही की अक्षमता: एक विश्लेषण
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए सुधार, प्रभावी क्रियान्वयन और व्यापक परिवर्तन को बेहद जरूरी बताया है। उन्होंने विभिन्न अवसंरचना परियोजनाओं की समीक्षा करते हुए इस बात पर जोर दिया कि सरकारी हस्तक्षेप कम होना चाहिए और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़नी चाहिए। जीएसटी जैसे सुधारों से आम आदमी को लाभ मिला है, लेकिन अन्य सुधारों का लाभ मिलने में अभी समय लगेगा।
सरकारी नियंत्रण कम करने की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में सरकारी हस्तक्षेप अभी भी अधिक है। विदेशी निवेशक और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में कारोबारी सुगमता में सुधार के बावजूद यहां व्यापार स्थापित करने में बाधाएं महसूस करती हैं। कदम-कदम पर सरकारी अनुमति की आवश्यकता उद्योग-व्यापार के विकास में बाधक बन रही है। यह स्थिति केवल केंद्र सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य सरकारों का रवैया भी उद्योग-व्यापार के प्रति बहुत अनुकूल नहीं है, जो ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य में बाधा खड़ी कर रहा है।
विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए जैसी कारोबारी सुगमता होनी चाहिए, वैसी नहीं है। यह केवल कागजों पर नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखनी चाहिए। सरकारी तंत्र को जन समस्याओं के समाधान में तत्पर दिखना चाहिए, लेकिन अधिकांश मामलों में इस तत्परता का अभाव ही दिखता है। शहरी ढांचे को ठीक करने और नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले विभागों के कामकाज की गुणवत्ता भी चिंताजनक है। पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव भी व्याप्त है।
समस्या केवल सरकारी कामकाज में गुणवत्ता के अभाव की नहीं है, यह उद्योग-व्यापार जगत में भी देखने को मिलती है। सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में कामकाज की गुणवत्ता में सुधार करके ही विकसित भारत की नींव को मजबूत किया जा सकता है। जब सरकारी कामकाज दोयम दर्जे का होता है, तो उसका दुष्प्रभाव कहीं अधिक होता है, क्योंकि हर जगह सरकारी दखल है और सरकारें सबसे बड़ी नियोक्ता हैं। औसत सरकारी कर्मियों का काम न तो पारदर्शी ढंग से होता है और न ही जवाबदेह।
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