गुरु तेग बहादुर: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जनक और राष्ट्र-निर्माता
गुरु तेग बहादुर जी ने न केवल भारतीय समाज को मुगलों के क्रूर शासन के खिलाफ एकजुट किया, बल्कि उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जनक भी माना जाता है। उनका जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था। उनके पिता, छठे गुरु हरगोबिंद साहिब और माता नानकी ने उन्हें ‘त्याग मल’ नाम दिया, जो उनके त्यागी और वीतरागी स्वभाव को दर्शाता है।
बचपन से ही त्याग मल को शस्त्र विद्या में निपुणता की शिक्षा मिली। जब मुगलों ने गुरु नानक देव की निर्वाण स्थली करतारपुर पर हमला किया, तो सिखों ने वीरता से मुकाबला किया। इस हमले का नेतृत्व पैंदा खान कर रहा था, जिसे गुरु हरगोबिंद जी ने पाला था, लेकिन वह बाद में मुगलों से जा मिला। 14 वर्ष की आयु में, त्याग मल ने करतारपुर की लड़ाई में पैंदा खान को परास्त कर दिया। इस असाधारण वीरता से प्रसन्न होकर, पिता हरगोबिंद ने उनका नाम ‘तेग बहादुर’ रख दिया, जिसका अर्थ है ‘खड्ग का महावीर’ यानी तलवार का शूरवीर।
गुरु तेग बहादुर जी साधना, तप और आध्यात्मिक रुचि के धनी थे। गुरु ग्रन्थ साहिब में उनकी 116 रचनाएं संग्रहीत हैं, जिनमें 59 शबद और 57 श्लोक शामिल हैं। ये सभी रचनाएं सुंदर और सरल ब्रज भाषा में हैं, जिन्हें उन्होंने राग जय जयवंती में रचा, जो सनातन परंपरा में शौर्य और वीरता का प्रतीक है। उनकी रचनाओं में आध्यात्मिक ऊंचाई और दार्शनिक गहराई स्पष्ट झलकती है।
उन्होंने समाज में असंगठित और हताश भरे माहौल में नई जान फूंकी और मुगलों को अपनी निर्भीकता का परिचय देते हुए कहा, “भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन” – अर्थात्, न मैं किसी को भय देता हूं, न किसी से भय मानता हूं। उनके होंठों पर सदैव गोविन्द, हरि और श्री राम का नाम रहता था। उनकी रचनाएं, जो गुरु ग्रन्थ साहिब के नौवें महला (खंड) में संकलित हैं, भक्तों की आंखों में भक्ति के आंसू ले आती हैं। उनकी वाणी इतनी सरल है मानो हिंदी के दोहे सुन रहे हों।
यह विडंबना है कि गुरु तेग बहादुर जी की यह अमूल्य वाणी भारतीय हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है। उनकी शिक्षाएं और रचनाएं सम्पूर्ण भारत के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अध्ययन का एक अभिन्न अंग होनी चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी उनकी वीरता, अध्यात्म और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान से प्रेरणा ले सके।
