आगरा की बेड़ई: कचौड़ी की बहन, जो सुबह की भूख का चटपटा जवाब है
आगरा शहर की सुबह का आगाज़ अक्सर कचौड़ी की छोटी बहन ‘बेड़ई’ और उसकी चटपटी आलू की सब्जी के साथ होता है। यह स्वादिष्ट नाश्ता, जो सदियों से चला आ रहा है, आज भी शहरवासियों और पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय है। मिठाई की दुकानों से लेकर सड़क के किनारे लगे ठेलों तक, हर जगह सुबह-सुबह घी, रिफाइंड और सरसों के तेल में सिकती सुनहरी बेड़ई और बगल में उबलती आलू की मसालेदार सब्ज़ी का नज़ारा आम है।
इतिहासकारों के अनुसार, बेड़ई का उद्भव गुप्त काल की मसालेदार पूड़ी से हुआ, जिसने धीरे-धीरे कचौड़ी का रूप लिया और अंततः ‘बेड़ई’ के नाम से जानी जाने लगी। हालांकि बेड़ई बनाने की विधि में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है, लेकिन इसके साथ परोसी जाने वाली आलू की सब्ज़ी को और भी चटपटा बनाने पर ज़ोर दिया जाता है। साथ में परोसा जाने वाला रायता और गर्म बेड़ई को छाछ में भिगोकर खाना इसके स्वाद को और बढ़ा देता है।
बेलनगंज के तिकौनिया स्थित ‘रामा कचौड़ी वाले’ इस पारंपरिक नाश्ते को तीसरी पीढ़ी से बना रहे हैं। दुकान के संचालकों के अनुसार, उनके पिता रामा ने वर्ष 1955 में मैदा की कचौड़ी की जगह आटे की लोई में उड़द की दाल भरकर बेड़ई बनाना शुरू किया था। शुरुआत में इसे केवल सरसों के तेल में ही तैयार किया जाता था और इसके साथ घर पर तैयार किए गए मसालों से बनी आलू की सब्ज़ी परोसी जाती थी।
शुरुआत में पुराने शहर के निवासी ही इसका लुत्फ़ उठाते थे, लेकिन धीरे-धीरे बेड़ई के ठेलों की संख्या बढ़ने लगी। मिठाई विक्रेताओं ने भी बेड़ई और जलेबी बनाना शुरू कर दिया। आज मोती कटरा में ‘ब्रज भोग’ की बेड़ई, सेंट जोंस कॉलेज चौराहा, राजा की मंडी, कमला नगर, आवास विकास कॉलोनी और प्रतापपुर में ‘देवीराम’ की बेड़ई, नुनिहाई में ‘दाऊजी’ की बेड़ई काफी पसंद की जाती हैं।
इस लज़ीज़ नाश्ते का स्वाद पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी भी चख चुके हैं। वर्ष 1990 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मस्थली फरह के दौरे पर आए वाजपेयी को बेलनगंज की बेड़ई और जलेबी इतनी पसंद आई थी कि उन्होंने आगरा से इन्हें मंगवाकर खाया था। यह किस्सा आज भी स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय रहता है, जो आगरा की बेड़ई के महत्व को दर्शाता है।
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