गाजियाबाद में ‘सांस’ अभियान शुरू: निमोनिया से बच्चों को बचाने की पहल
गाजियाबाद में ‘सांस’ (सोशल अवेयरनेस एंड एक्शन टू न्यूट्रलाइज्ड निमोनिया सक्सेसफुली) अभियान की शुरुआत की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य सांस लेने में तकलीफ से जूझ रहे, विशेषकर बच्चों को प्रभावी ढंग से उपचार प्रदान करना है। विश्व निमोनिया दिवस बीत जाने के बावजूद, स्वास्थ्य विभाग सर्दी और बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण बच्चों में निमोनिया के बढ़ते मामलों को लेकर गंभीर है। इस अभियान के माध्यम से, प्रदेश के सभी जिलों में सौ से अधिक चिकित्सकों को जिम्मेदारी सौंपी गई है ताकि वे मरीजों की पहचान कर उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता पहुंचा सकें।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अखिलेश मोहन के अनुसार, भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के तहत यह अभियान चलाया जा रहा है। ‘सांस’ अभियान की टैगलाइन ‘निमोनिया नहीं तो बचपन सही’ है, जो निमोनिया की रोकथाम और समय पर समुचित इलाज के महत्व को दर्शाती है। इसका लक्ष्य पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु दर को कम करना है। रिपोर्टों के अनुसार, पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में लगभग 17.5 प्रतिशत मौतें निमोनिया के कारण होती हैं। अकेले गाजियाबाद में अप्रैल से 22 नवंबर तक इस बीमारी से दस से अधिक बच्चों की जान जा चुकी है।
निमोनिया फेफड़ों का एक गंभीर संक्रमण है जो बैक्टीरिया, वायरस और फंगल संक्रमण से हो सकता है। बच्चों में इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें जन्म के समय कम वजन, कुपोषण, अपर्याप्त स्तनपान, घरेलू प्रदूषण, खसरा, पीसीवी टीकाकरण का अभाव, और जन्मजात विकृतियां शामिल हैं। इस अभियान के तहत, निमोनिया से बचाव, रोकथाम और उपचार के लिए एक व्यापक ‘पीपीट’ (सुरक्षा, बचाव, उपचार) रणनीति अपनाई जाएगी। इसमें शिशु के अच्छे स्वास्थ्य के लिए छह माह तक केवल स्तनपान, उसके बाद अनुपूरक आहार, विटामिन-ए, टीकाकरण, हाथों की स्वच्छता, स्वच्छ पेयजल और गृह प्रदूषण को दूर करने जैसे उपाय शामिल हैं।
समुदाय स्तर पर जन जागरूकता अभियान चलाकर निमोनिया के संदिग्ध मामलों की शीघ्र पहचान और उपचार सुनिश्चित किया जाएगा। स्वास्थ्य इकाइयों पर इस कार्यक्रम के लिए आवश्यक प्रचार सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी और ओपीडी व आईपीडी वार्डों में निमोनिया के नवीन उपचार प्रोटोकॉल का पालन किया जाएगा। स्वास्थ्य कर्मियों के क्षमतावर्धन पर भी जोर दिया जाएगा ताकि वे इस गंभीर बीमारी से निपटने में अधिक सक्षम हो सकें। यह अभियान 28 फरवरी 2026 तक जारी रहेगा, जिसका उद्देश्य बाल मृत्यु दर को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करना है।
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