कानपुर देहात के रसूलाबाद में स्थित नार कहिंजरी का राजा दरियाव चंद्र का किला 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण गवाह है। यह किला क्रांतिकारियों की गतिविधियों का केंद्र था, जहाँ रियासतदारों और वीर...
कानपुर देहात के रसूलाबाद में स्थित नार कहिंजरी का राजा दरियाव चंद्र का किला 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण गवाह है। यह किला क्रांतिकारियों की गतिविधियों का केंद्र था, जहाँ रियासतदारों और वीर सपूतों ने मिलकर अंग्रेजी सेना पर हमला किया और उन्हें गंगापार तक खदेड़ दिया था। इस दौरान सरकारी खजाना भी लूटा गया था। इस ऐतिहासिक घटना के बाद, राजा दरियावचंद्र को गिरफ्तार कर लिया गया और धर्मगढ़ परिसर में एक नीम के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गई।
किले का इतिहास तक्षशिला के राजा नार ऋषिदेव से जुड़ा है, जिन्होंने रिंद नदी के किनारे नार कालिंजर नगर बसाया था और एक विशाल गढ़ी का निर्माण कराया था, जो अब नार कहिंजरी के नाम से जानी जाती है।
1857 में, जब स्वतंत्रता की जंग का ऐलान हुआ, तो गौर राजा दरियावचंद्र ने इसी किले से देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने और अंग्रेजों से लोहा लेने की रणनीति बनाई। उनकी अगुवाई में रणबांकुरों ने अंग्रेजों के खिलाफ जंग का शंखनाद किया। उन्होंने रसूलाबाद तहसील का सरकारी खजाना लूटा और गोरों की फौज को गंगापार तक खदेड़ने में सफलता प्राप्त की।
18 दिनों तक चली आजादी की जंग
नार के किले से 10 नवंबर से 28 नवंबर 1857 के बीच 18 दिनों तक चली इस जंग में अंग्रेजी सेना बुरी तरह पस्त हो गई थी। इस दौरान कई क्रांतिकारी शहीद हुए, जिनकी कहानियां आज भी गुमनामी में हैं। विद्रोह थमने के बाद, अंग्रेजों ने रसूलाबाद तहसील को खत्म कर दिया और नार के किले पर हमला किया। हालाँकि, किले की मजबूत दीवारों और क्रांतिकारियों के शौर्य के कारण अंग्रेजी सेना को भारी निराशा हाथ लगी। क्रांतिकारियों के अदम्य साहस ने अंग्रेजी सेना को लगभग परास्त कर दिया था।
गद्दारी और राजा को फांसी
बाद में, एक जमींदार की गद्दारी का फायदा उठाकर अंग्रेजों ने राजा दरियावचंद्र को धोखे से गिरफ्तार कर लिया। उन्हें रसूलाबाद लाकर तहसील भवन और धर्मगढ़ मंदिर परिसर के पास खड़े नीम के पेड़ पर फांसी दे दी गई। इसके बाद, अंग्रेजी फौज ने उनके किले को ध्वस्त करने का प्रयास किया, लेकिन किले की ऊंची और मोटी दीवारें पूरी तरह से ढहाने में वे सफल नहीं हो सके। अंग्रेजों ने राजा दरियावचंद्र की जब्त की गई रियासत को खानपुर डिलवल के पहलवान सिंह को इनाम के तौर पर दे दिया। यह किला आज भी उन शहीदों के शौर्य और बलिदान की कहानी कहता है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।