दलमा बना बाघों का नया घर: गिनती शुरू, कैमरे और पगमार्क से होगी गणना
झारखंड के दलमा वन्यजीव अभयारण्य में एक बार फिर बाघों के दीदार की उम्मीदें परवान चढ़ने लगी हैं। वन विभाग ने बाघों की गिनती की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस बार गिनती के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है। कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं और बाघों के पगमार्क (पदचिन्हों) का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि अभयारण्य में मौजूद बाघों की सटीक संख्या का अनुमान लगाया जा सके।
यह कवायद अखिल भारतीय बाघ गणना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो पूरे देश में बाघों की आबादी का जायजा लेने के लिए आयोजित की जाती है। दलमा वन्यजीव अभयारण्य, अपनी घनी वनस्पतियों और अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण, बाघों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल के रूप में उभर रहा है। पिछले कुछ समय से यहां बाघों की हलचल देखी जा रही थी, जिसने वन विभाग और वन्यजीव प्रेमियों के बीच उत्साह पैदा किया है।
सूत्रों के अनुसार, इस गणना के लिए कई चरणों में काम किया जाएगा। पहाड़ी इलाकों से लेकर तराई क्षेत्रों तक, कुल 600 कैमरों की मदद से बाघों की गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी। कैमरा ट्रैप न केवल बाघों की उपस्थिति की पुष्टि करेंगे, बल्कि उनकी संख्या, लिंग और उम्र के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे। इसके साथ ही, वनकर्मी नियमित रूप से पगमार्क की तलाश और उनका दस्तावेजीकरण करेंगे, जो बाघों की पहचान और उनकी संख्या का अनुमान लगाने में सहायक होगा।
वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि दलमा में बाघों की बढ़ती संख्या एक सकारात्मक संकेत है। यह न केवल इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को दर्शाता है, बल्कि बाघ संरक्षण के प्रयासों की सफलता का प्रमाण भी है। बाघों की सुरक्षित उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए अभयारण्य के आस-पास के क्षेत्रों में गश्त बढ़ाई गई है और अवैध शिकार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।
यह गणना देश के उन हिस्सों में भी बाघों की उपस्थिति का पता लगाने में मदद करेगी जहां पहले उनकी संख्या नगण्य मानी जाती थी। विशेष रूप से, उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद जैसे जंगल भी बाघों के लिए ‘गुप्त ठिकाने’ के रूप में सामने आ रहे हैं। पीटीआर (पेंच टाइगर रिजर्व) जैसे क्षेत्र पहले से ही देश में बाघों के सुरक्षित ठिकानों के रूप में जाने जाते हैं, और बाघों की बढ़ती संख्या से इन क्षेत्रों में और भी अधिक उम्मीदें जगी हैं। यह गिनती न केवल बाघों की वर्तमान स्थिति का आकलन करेगी, बल्कि भविष्य की संरक्षण योजनाओं को बनाने के लिए एक मजबूत आधार भी प्रदान करेगी।
