दहेज का दानव: पवित्र रिश्ते को लील रहा लालच, न्याय की गुहार
विवाह, जिसे आपसी विश्वास और सम्मान का पावन बंधन माना जाता है, आज दहेज के लालच के कारण एक व्यावसायिक लेनदेन बनता जा रहा है। उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान इस चिंता को व्यक्त किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जिसे अक्सर ‘उपहार’ या ‘मर्जी से दिया गया चढ़ावा’ बताकर छुपाने का प्रयास किया जाता है, वह असल में सामाजिक रुतबा दिखाने और पैसों के लालच को पूरा करने का एक जरिया बन गया है।
यह टिप्पणी एक ऐसे व्यक्ति की जमानत याचिका खारिज करते हुए की गई, जिस पर अपनी पत्नी को शादी के महज चार महीने बाद दहेज के लिए जहर देने का गंभीर आरोप था। शीर्ष न्यायालय ने इस कृत्य को एक ‘बहुत गंभीर अपराध’ करार दिया और कहा कि इसके कारण महिलाओं पर घोर अन्याय हो रहा है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि दहेज की मांगें अक्सर क्रूरता का रूप ले लेती हैं, और एक निर्दोष महिला को दूसरों के लालच की कीमत चुकानी पड़ती है, यहाँ तक कि अपनी जान गँवानी पड़ती है।
यह समस्या कितनी गहरी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रति वर्ष हजारों महिलाओं की जान दहेज के कारण चली जाती है। यह सामाजिक अभिशाप आज भी समाज में व्याप्त है, खासकर ग्रामीण भारत में जहाँ लगभग 95% विवाहों में दहेज का लेन-देन होता है।
हालांकि, समाज में कुछ ऐसी उम्मीदें भी जगाने वाली खबरें आती हैं। हाल ही में एक ऐसे युवक की कहानी सामने आई जिसने शादी में मिले 31 लाख रुपये यह कहकर लौटा दिए कि वह लड़की के पिता की मेहनत की कमाई को नहीं ले सकता। ऐसी मिसालें समाज को आइना दिखाती हैं और यह उम्मीद जगाती हैं कि शायद एक दिन ऐसा भी आए जब दहेज एक बीती हुई बात बन जाए।
यह दुखद है कि ऐसे सकारात्मक उदाहरणों के बावजूद, दहेज की भयावहता कम नहीं हो रही है। दशकों पहले दूरदर्शन पर प्रसारित एक कार्यक्रम की याद दिलाते हुए, जिसमें एक महिला को उसके पति ने दहेज के लिए जला दिया था, यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या कितनी पुरानी और क्रूर है। उस समय भी, पीड़ित महिला के समर्थन में कई सामाजिक संगठन खड़े हुए थे, जिन्होंने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। आज भी, ऐसी घटनाओं से आहत परिवार और संगठन न्याय की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन दहेज का दानव अपनी पकड़ ढीली करने को तैयार नहीं है।
