आगरा में परिषदीय परीक्षा में ‘पंडित’ शब्द पर विवाद, शिक्षक संघ ने बताया अपमान | Agra news
उत्तर प्रदेश में परीक्षाओं और विवादों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में पुलिस भर्ती परीक्षा में जातिगत विकल्प को लेकर हुए हंगामे के बाद अब आगरा में परिषदीय स्कूलों की वार्षिक परीक्षा में पूछे गए एक सवाल ने नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। कक्षा सात की संस्कृत परीक्षा में ‘पंडित’ शब्द के प्रयोग को लेकर शिक्षक संगठनों ने कड़ा ऐतराज जताया है।
शिक्षक संगठनों का आरोप है कि इस प्रश्न के माध्यम से एक विशेष वर्ग को अपमानित करने का प्रयास किया गया है। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के जिलामंत्री बृजेश दीक्षित ने दावा किया कि यह सवाल जानबूझकर शामिल किया गया है, क्योंकि यह कक्षा सात की पाठ्यपुस्तक के सातवें पाठ में मौजूद नहीं है। उन्होंने इस मामले में आंदोलन की जांच की मांग करते हुए आंदोलन की चेतावनी भी दी है।
विवाद बढ़ने पर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) जितेंद्र कुमार गोंड़ और डायट प्राचार्य अनिरुद्ध यादव ने स्थिति स्पष्ट की। अधिकारियों ने बताया कि यह प्रश्न किसी जाति विशेष को लक्षित करके नहीं पूछा गया है। यह संस्कृत की एक अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध पहेली है, जिसका श्लोक है: “अपादो दूरगामी च साक्षरो न च पण्डितः। अमुखः स्फुटवक्ता च यो जानाति स पण्डितः॥”
अधिकारियों ने इस श्लोक का अर्थ समझाते हुए बताया कि यहां ‘पंडित’ शब्द का प्रयोग ‘विद्वान’ या ‘ज्ञानी’ के संदर्भ में किया गया है, न कि किसी जाति के लिए। इस पहेली का सही उत्तर ‘पत्र’ (Letter) है। पहेली का अर्थ है कि पत्र के पैर नहीं होते फिर भी वह दूर तक जाता है, वह अक्षरों से युक्त (साक्षर) है पर विद्वान (पंडित) नहीं है, उसका मुख नहीं है पर वह स्पष्ट बोलता है।
हालांकि विभाग ने इसे विशुद्ध रूप से शैक्षणिक और साहित्यिक प्रश्न बताया है, लेकिन शिक्षक नेताओं का तर्क है कि वर्तमान संवेदनशील माहौल में ऐसे शब्दों के चुनाव से बचना चाहिए था। आगरा में इस मुद्दे को लेकर ब्राह्मण समाज के संगठनों में भी चर्चा तेज है। फिलहाल प्रशासन स्थिति को शांत करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल प्रश्न पत्र ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।
