उच्च शिक्षा में आरक्षण का बड़ा असर, सवर्णों को पीछे छोड़ आरक्षित वर्ग ने रचा इतिहास
भारतीय समाज में आरक्षण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो सामाजिक न्याय और समानता पर आधारित है। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि आरक्षण ने वंचित समुदायों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब नौकरियां हों या उच्च शिक्षण संस्थान में पढ़ाई की बात हो, सवर्ण जातियों का प्रभुत्व दिखता था। एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग के लोग यहां कम दिखाई देते थे। 1990 में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के साथ नीतिगत स्तर पर इस बात की जरूरत महसूस की गई कि देश की विकास यात्रा में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी होनी चाहिए। इसी सोच के साथ एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग को नौकरियों के साथ उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में भी आरक्षण का प्रविधान किया गया।
समय के साथ इसके सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं। आइआइएम उदयपुर के एक अध्ययन में पता चला है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन के मोर्चे पर आरक्षित वर्ग के छात्रों ने सामान्य वर्ग को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है। आरक्षित वर्ग के छात्रों की संख्या बढ़ कर 60.8 प्रतिशत हो गई है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आए इस समावेशी बदलाव और देश के विकास पर इसके संभावित प्रभाव की पड़ताल ही आज का मुद्दा है।
उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन की बात करें तो आरक्षित वर्ग इनमें आगे निकल चुके हैं। आंकड़ों के अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों में सामान्य वर्ग के अभ्यार्थी 39.2 प्रतिशत हैं, तो एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के अभ्यार्थियों की संख्या 60.8 प्रतिशत हो गई है। इसके अलावा कैटेगरी के हिसाब से भी नामांकन में बदलाव देखने को मिला है। 2010-11 में सामान्य वर्ग के 56.9 प्रतिशत अभ्यार्थियों का नामांकन हुआ था, जो 2022-23 में घटकर 39.2 प्रतिशत हो गया है। वहीं, ओबीसी 27.6 प्रतिशत से बढ़कर 38.9 प्रतिशत, एसटी 4.4 प्रतिशत से बढ़कर 6.4 प्रतिशत और एससी 11.1 प्रतिशत से बढ़कर 15.5 प्रतिशत कर पहुंच गए हैं। यह डेटा स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि आरक्षण नीति ने समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने में सफलता हासिल की है।
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