भाषाई अराजकता: भारत की एकता पर बढ़ता खतरा, राजनीतिक नाकामयाबी का नतीजा
यह विडंबना ही है कि जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है और ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना साकार हो रही है, वहीं देश के कुछ हिस्सों में भाषाई अराजकता बेलगाम होती जा रही है। यह आम धारणा के विपरीत है कि शिक्षा और समृद्धि के साथ संकीर्णता का भाव तिरोहित हो जाता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे अपेक्षाकृत समृद्ध और शिक्षित राज्यों में भाषाई असहिष्णुता का बढ़ता प्रसार इस मान्यता को चुनौती दे रहा है।
हाल ही में महाराष्ट्र के कल्याण में हुई एक घटना ने इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित किया। एक नौजवान ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे सहयात्री से संवाद के लिए हिंदी के कुछ शब्दों का प्रयोग करने पर अपमानित और पीटा गया। यह घटना इस बात पर गहरा प्रश्नचिन्ह लगाती है कि क्या हिंदी बोलना इतना बड़ा अपराध हो गया है कि किसी को सरेआम अपमानित और प्रताड़ित किया जाए। इस हृदय विदारक मामले में राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की चुप्पी चिंता का विषय है।
इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी, नर्मदाशंकर उपाध्याय, केशवचंद्र सेन, सुभाष चंद्र बोस और लोकमान्य तिलक जैसे अनेक गैर-हिंदी भाषियों ने हिंदी की राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोने की क्षमता को पहचाना था। उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा बनाने का सपना देखा था। यद्यपि राजनीतिक कारणों से हिंदी राष्ट्रभाषा के स्थान पर आसीन नहीं हो सकी, परंतु उसकी सामर्थ्य निर्विवाद है।
कई क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतें हिंदी के विस्तार से भयभीत हैं, जबकि हिंदी का प्रसार उसकी अभिव्यक्ति की सशक्त माध्यम बनने की क्षमता के कारण हुआ है। हिंदी में विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच सहज संवाद स्थापित करने की अद्भुत क्षमता है, इसी कारण संकीर्णता से ग्रस्त क्षेत्रीय सियासी ताकतें उससे डरती हैं। उन्हें हिंदी के माध्यम से अपनी राजनीतिक अस्मिता खतरे में नजर आती है, और इसी डर के चलते वे हिंदी भाषियों को निशाना बनाती हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे और उनकी पार्टी इस प्रवृत्ति में अक्सर आगे दिखाई देते हैं। जब भी राज ठाकरे हाशिए पर जाते दिखते हैं, भाषाई अराजकता उनका प्रिय हथियार बन जाती है।
आजादी के 75 वर्षों बाद भी, जहाँ भारतीय अस्मिता की बात होनी चाहिए, वहीं वर्तमान राजनीति ने उपराष्ट्रीयताओं को बढ़ावा दिया है, जिससे बांग्ला, मराठी, कन्नड़, तमिल जैसी खंडित अवधारणाएं प्रस्तुत हुई हैं। क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों के लिए अपनी भाषा का सवाल उठाना चुनावी सफलता की गारंटी बनता जा रहा है। महाराष्ट्र की राजनीति में अस्तित्व के संकट से जूझ रहे ठाकरे बंधु, राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे, अब साथ आ चुके हैं। बालासाहेब ठाकरे के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले राज ठाकरे को खास राजनीतिक सफलता नहीं मिल पाई है।
परिणामस्वरूप, राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए उनके पास मराठी के नाम पर गैर-मार्ची भाषियों को प्रताड़ित करने जैसा एक ही औजार बचा है। राज ठाकरे ऐसा करके बालासाहेब की विरासत को आगे बढ़ाने का भ्रम बनाए हुए हैं। यह सवाल उठता है कि जिस हिंदी सिनेमा के लिए मुंबई विश्व विख्यात है, उसे राज ठाकरे और उनके लोग मुंबई से क्यों नहीं खदेड़ देते? बॉलीवुड न केवल महाराष्ट्र की वैश्विक पहचान है, बल्कि यह रोजगार और करों का एक बड़ा जरिया भी है। राज ठाकरे की मराठी अस्मिता की वीरता केवल कमजोर हिंदी भाषियों पर ही फूटती हुई प्रतीत होती है।
