बंजर जमीन पर अमरूद की खेती: औरंगाबाद में किसानों ने बदली तकदीर
औरंगाबाद के पहड़तली इलाके में मरुस्थल सी लगने वाली बंजर जमीन अब हरियाली से लहलहा रही है। पांच प्रगतिशील किसानों ने पत्थर पर दूब जमाने वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए करीब छह साल पहले बंजर जमीन पर अमरूद की खेती शुरू की थी। आज यह खेती 150 एकड़ में फैल चुकी है और इसकी महक बिहार से लेकर झारखंड तक पहुंच रही है।
कुटुंबा प्रखंड के दधपा बिगहा निवासी नरेश मेहता, विश्वनाथ कुमार, संजय कुमार, राजेंद्र वर्मा एवं ब्रजेश कुमार ने देव प्रखंड के दुलारे पंचायत स्थित दुर्गी गांव के पास इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अंजाम दिया है। वर्षों तक परंपरागत खेती जैसे धान, गेहूं और दालों पर निर्भर रहने वाले इन किसानों ने बदलते मौसम, बढ़ती लागत और घटते मुनाफे को देखते हुए अमरूद की खेती को एक नए विकल्प के रूप में चुना।
किसानों ने कृषि विभाग से मिली तकनीकी सलाह और सब्सिडी का लाभ उठाते हुए उन्नत किस्म के अमरूद के पौधे लगाए। ताइवान पिंक, वीएनआरवीई, थाई, इलाहाबाद सफेदा जैसी किस्में न केवल अधिक उत्पादन देती हैं, बल्कि उनका स्वाद भी लाजवाब होता है। इन उन्नत किस्मों के कारण औरंगाबाद के अमरूद की मांग न केवल स्थानीय बाजारों में है, बल्कि गया, पटना, भागलपुर, रोहतास, कैमूर जैसे बिहार के प्रमुख शहरों के अलावा झारखंड के कई शहरों से भी है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इन किसानों की पहल ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है, बल्कि पूरे क्षेत्र को फल उत्पादन के क्षेत्र में एक नई पहचान दिलाई है। हरे-भरे बागानों के बीच अमरूद की फैली खुशबू आसपास के गांवों के माहौल को एक प्राकृतिक सुगंध से भर रही है। यह परियोजना दर्शाती है कि सही योजना, कड़ी मेहनत और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके बंजर भूमि को भी उपजाऊ बनाकर समृद्धि हासिल की जा सकती है।
