बिहार विधानसभा चुनाव: गांवों की चौपाल से तय होगा सत्ता का समीकरण, 85% बूथ ग्रामीण क्षेत्रों में
बिहार की सियासत में गांवों का हमेशा से महत्वपूर्ण योगदान रहा है और आगामी विधानसभा चुनाव में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है। राज्य के ग्रामीण अंचलों से ही सत्ता की राह तय होने वाली है, क्योंकि कुल मतदान केंद्रों का एक बड़ा हिस्सा देहात में है।
निर्वाचन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, सूबे के कुल 90,712 मतदान केंद्रों में से 76,801 बूथ गांवों में बनाए गए हैं। इसका सीधा अर्थ है कि लगभग 85 प्रतिशत पोलिंग स्टेशन ग्रामीण इलाकों में होंगे, जबकि शहरी क्षेत्रों में केवल 13,911 मतदान केंद्र ही स्थापित किए गए हैं। यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सूबे का राजनीतिक भविष्य गांवों की चौपालों, खेत-खलिहानों और पंचायत भवनों से ही तय होगा।
ग्रामीण मतदाताओं की यह निर्णायक भूमिका हर राजनीतिक दल को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर रही है। सड़क, रोजगार, कृषि, बिजली और शिक्षा जैसे मूलभूत मुद्दे इन इलाकों में चुनावी चर्चा के केंद्र में हैं। राजनीतिक पार्टियां अब ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रही हैं, क्योंकि गांवों के वोटरों की भागीदारी जितनी अधिक होगी, परिणाम उतने ही दिलचस्प और अप्रत्याशित हो सकते हैं। इस बार लोकतंत्र का मेला गांवों में ही अपने चरम पर होगा।
जिलावार आंकड़ों पर गौर करें तो पटना राज्य का ऐसा जिला है जहां सर्वाधिक 5669 मतदान केंद्र बनाए गए हैं, जिनमें 2659 शहरी क्षेत्र में और 3006 ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। इसके बाद मुजफ्फरपुर में 4186 मतदान केंद्र बने हैं, जिनमें 563 शहरी क्षेत्र में हैं, जो ग्रामीण बूथों की विशाल संख्या को इंगित करता है। वहीं, शिवहर जिले में सबसे कम मतदान केंद्र स्थापित किए गए हैं।
यह स्पष्ट है कि बिहार विधानसभा चुनाव में सत्ता की चाभी गांवों के मतदाताओं के हाथ में होगी। जो दल ग्रामीण मुद्दों को बेहतर ढंग से संबोधित कर पाएगा और ग्रामीण जनता का विश्वास जीत पाएगा, वही सत्ता के सिंहासन पर काबिज होने में सफल होगा।
